chevron_left  तापसानांarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय ११५
वैशम्पाय़न उवाच
तापसानां परं चक्रे सत्कारं भ्रातृभिः सह ||
१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
नारद उवाच
तापसानां प्रशस्यन्ते गच्छ सञ्जय़ माचिरम् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय ८६
धौम्य उवाच
तापसानामरण्यानि कीर्तितानि यथाश्रुति ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
तापसानामलङ्कारं धारय़न्तं धनुर्धरम् ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
तापसारण्यमतुलं दिव्यकाननदर्शनम् ||
५७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७७
भीष्म उवाच
तापसास्ते महात्मानो भृगुश्रेष्ठपुरस्कृताः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
तापसी तु ततः शक्रमुवाच प्रय़ताञ्जलिः |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
तापसेनास्य पुत्राणामाश्रमेऽप्यभवच्छतम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
तापसेषु हि विश्वासमपि कुर्वन्ति दस्यवः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११
अर्जुन उवाच
तापसैः सह संवादं शक्रस्य भरतर्षभ ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
तापसैः सह संवृद्धा मातृभ्यां परिरक्षिताः |
७० क
आदि पर्व
अध्याय ३९
सूत उवाच
तापसैरुपनीतानि फलानि सहिता मय़ा ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
तापसैर्भ्रातृभिश्चैव सर्वतः परिवारितम् ||
३८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
तापसैश्च महाभागैर्नानादेशसमागतैः |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ६
धृतराष्ट्र उवाच
तापस्ये मे मनस्तात वर्तते कुरुनन्दन |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ५
विदुर उवाच
तापो न ते वै भविता प्रीतिय़ोगा; त्त्वं चेन्न गृह्णासि सुतं सहाय़ैः |
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
तापय़न्तौ शरैस्तीक्ष्णैरन्योन्यं तौ महारथौ |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
तापय़ामास च द्रौणिं शैनेय़ः परवीरहा |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
तापय़ामास तत्सैन्यं देहं व्याधिगणो यथा ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
तापय़ामास तत्सैन्यं भुवनं भास्करो यथा ||
७१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
तापय़ामास तत्सैन्यं महोल्का पतती यथा ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
तापय़ामास तान्वाणैः सूतपुत्रो महारथः |
१२० क
आदि पर्व
अध्याय १७०
गन्धर्व उवाच
तापय़ामास लोकान्स सदेवासुरमानुषान् |
१२ क
स्त्री पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
ताभिः परिवृतो राजा रुदतीभिः सहस्रशः |
१७ क
स्त्री पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
ताभिः परिवृतो राजा रुदतीभिः सहस्रशः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
ताभिः शत्रून्प्रतिव्यूह्य जहीन्द्रो दानवानिव ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०८
गुरुरु उवाच
ताभिः संसक्तमनसो व्रह्मवत्सम्प्रकाशते |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
ताभिः सखीभिः सहिता सर्वाभिर्मुदिता भृशम् ||
२ ग
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
ताभिः सम्यक्प्रय़ुक्ताभिर्लोकय़ात्रा विधीय़ते ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
ताभिः सर्वाभिः सहिताभिः समेत्य; स्त्रीभिर्वृद्धाभिरभिवादं वदेथाः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
ताभिः सह समापेतुर्व्राह्मणाः संशितव्रताः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय २०८
नार्यु उवाच
ताभिः सार्धं प्रय़ातास्मि लोकपालनिवेशनम् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
ताभिराप्याय़ितवला लोकान्वै धारय़िष्यथ ||
५७ ख
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
ताभिराभरणैः शव्दस्त्रासिताभिः समीरितः |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
ताभिर्नागलोको धूपितः ||
१५८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
ताभ्यः कामान्यथाकामं प्रादाद्धि स पितामहः |
९ क
वन पर्व
अध्याय १२६
लोमश उवाच
ताभ्यस्त्वमात्मना पुत्रमेवंवीर्यं जनिष्यसि ||
२३ ग
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
ताभ्यां च यत्र स मुनिर्यौवनं प्रतिपादितः ||
११८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
ताभ्यां च सम्परिष्वक्तः सान्त्वितश्च महाभुजः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
ताभ्यां च सहितः शक्रो विजिग्ये दैत्यदानवान् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
ताभ्यां चाभ्यधिको भक्ष्यो न कश्चिद्विद्यते क्वचित् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
ताभ्यां चैव भय़ं राज्ञः पश्य राज्यस्य योजनम् |
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७१
सञ्जय़ उवाच
ताभ्यां तत्र शरैर्मुक्तैरन्तरिक्षं दिशस्तथा |
१० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
ताभ्यां तथ्यं तदाचख्यौ यदस्यात्मचिकीर्षितम् ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५९
युधिष्ठिर उवाच
ताभ्यां दानं कतरस्मै विशिष्ट; मय़ाचमानाय़ च याचते च ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०५
द्रोण उवाच
ताभ्यां दुर्योधनः सार्धमगच्छद्युद्धमुत्तमम् |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
ताभ्यां द्यूतं समाय़त्तं विजय़ाय़ेतराय़ वा |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
ताभ्यां प्रतिगृहीतं तद्वृष्णिचक्रं समृद्धिमत् |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११८
नारद उवाच
ताभ्यां प्रतिष्ठितो लोके परलोके च नाहुषः ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
ताभ्यां मुक्ता महावाणाः कङ्कवर्हिणवाससः |
१८ क