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सभा पर्व
अध्याय ६३
भीम उवाच
नाहं कुप्ये सूतपुत्रस्य राज; न्नेष सत्यं दासधर्मः प्रविष्टः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
नाहं क्वचित्सञ्जय़ पाण्डवानां; मिथ्यावृत्तिं काञ्चन जात्वपश्यम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७४
अम्वो उवाच
नाहं गमिष्ये भद्रं वस्तत्र यत्र पिता मम |
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय १७०
व्राह्मण्यु उवाच
नाहं गृह्णामि वस्तात दृष्टीर्नास्ति रुषान्विता |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १०९
मृग उवाच
नाहं घ्नन्तं मृगान्राजन्विगर्हे आत्मकारणात् |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
नाहं जनं निर्दहेय़ं दृष्ट्वा घोरेण चक्षुषा |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५३
कर्ण उवाच
नाहं जीवति गाङ्गेय़े योत्स्ये राजन्कथञ्चन |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
नाहं जीवति गाङ्गेय़े योत्स्ये राजन्कथञ्चन |
२७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४२
सूत उवाच
नाहं तं वेद्मि नासौ मां न च मेऽस्ति विरागता ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३३
व्राह्मण उवाच
नाहं तथा भीरु चरामि लोके; तथा त्वं मां तर्कय़से स्ववुद्ध्या |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
नाहं तथा ह्यर्जुनाद्वासुदेवा; द्भीमाद्वापि यमय़ोर्वा विभेमि |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
नाहं तदनुशोचामि नात्मभ्रंशं शचीपते |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३५
कुन्त्यु उवाच
नाहं तदभ्यसूय़ामि यथा वागभ्यभाषत |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
नाहं तस्य मुनेर्भूय़ो वशगा स्यां कथञ्चन |
६५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
नाहं तातस्तव पितुस्तातोऽस्मि तव भारत |
८८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
नाहं तामभ्यसूय़ामि नमो धर्माय़ वेधसे |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४४
भीष्म उवाच
नाहं ते विप्रिय़ं कान्त कदाचिदपि संस्मरे |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७
व्यास उवाच
नाहं तेनाननुज्ञातस्त्वामाविक्षित कर्हिचित् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
नाहं त्वत्तो वरं काङ्क्षे नान्यस्मादपि दैवतात् |
९४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
नाहं त्वत्तोऽभिकाङ्क्षिष्ये वृत्त्युपाय़ं जनाधिप |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
नाहं त्वा नाभिजानामि विदितश्चासि मे द्रुम |
७ क
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
नाहं त्वां सह वैदेह्या समेतं कोसलागतम् |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
नाहं त्वामद्य मूढात्मन्दहेय़ं हि स्वतेजसा |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
दुःषन्त उवाच
नाहं त्वामभिजानामि यथेष्टं गम्यतां त्वय़ा ||
८० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
नाहं त्वय़ा समेष्यामि निर्वृतो भव लोमश ||
१६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
नाहं त्वय़ा समेष्यामि वृत्तो हेतुः समागमे |
१६६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
नाहं त्वय़्यन्यपूर्वाय़ां भार्यार्थी वरवर्णिनि ||
६ ग
वन पर्व
अध्याय २९४
व्राह्मण उवाच
नाहं दत्तमिहेच्छामि तदर्थिभ्यः प्रदीय़ताम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ८३
यय़ातिरु उवाच
नाहं देवमनुष्येषु न गन्धर्वमहर्षिषु |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
नाहं देवेन्द्र वत्स्यामि दानवेष्विति मे मतिः ||
७९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
कुण्डधार उवाच
नाहं धनानि याचामि व्राह्मणाय़ धनप्रद |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २९०
वैशम्पाय़न उवाच
नाहं धर्मं लोपय़िष्यामि लोके; स्त्रीणां वृत्तं पूज्यते देहरक्षा ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
नाहं धर्मफलान्वेषी राजपुत्रि चराम्युत |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
नाहं न भीमो न यमौ स त्वस्मान्वेद सुव्रतः ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय ५३
युधिष्ठिर उवाच
नाहं निकृत्या कामय़े सुखान्युत धनानि वा |
१० क
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
नाहं परकृतं दोषं त्वय़्याधास्ये कथञ्चन ||
२१ ग
आदि पर्व
अध्याय ९२
प्रतीप उवाच
नाहं परस्त्रिय़ं कामाद्गच्छेय़ं वरवर्णिनि |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५४
भीष्म उवाच
नाहं परेषां कर्माणि प्रशंसामि शपामि वा |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
नाहं पश्यामि भवतां तथावीर्यं धनुर्धरम् |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
नाहं पादौ धावय़िष्ये कदा चि; द्यावत्स्थितः पार्थ इत्यल्पवुद्धिः |
३८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
नाहं पुनरिहागन्ता मर्त्यलोकं परन्तप |
४० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
नाहं पुनरिहागन्ता लोकानालोकय़ाम्यहम् |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय २९
श्रीभगवानु उवाच
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमाय़ासमावृतः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११९
यय़ातिरु उवाच
नाहं प्रतिग्रहधनो व्राह्मणः क्षत्रिय़ो ह्यहम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
व्रह्मदत्त उवाच
नाहं प्रमाणं नैव त्वमन्योन्यकरणे शुभे |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६२
दुर्योधन उवाच
नाहं भवति न द्रोणे न कृपे न च वाह्लिके |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५७
दुर्योधन उवाच
नाहं भवति न द्रोणे नाश्वत्थाम्नि न सञ्जय़े |
१० क
वन पर्व
अध्याय २०६
व्राह्मण उवाच
नाहं भवन्तं शोचामि ज्ञानतृप्तोऽसि धर्मवित् ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
नाहं भीषय़ितुं शक्यः क्षत्रवृत्ते व्यवस्थितः ||
९७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
नाहं भीषय़ितुं शक्यो वाङ्मात्रेण कथञ्चन |
४ क