वन पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
नाहं भूय़ः कामय़े त्वां सहाय़ं; महीमिमां पालय़ितुं पुरं वा ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
नाहं भ्रातृवचो जातु कुर्यां क्रूरोपसंहितम् |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
नाहं मनांस्याददेय़ं मार्गे स्त्रीणामिति प्रभो |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
नाहं महेन्द्रादपि वज्रपाणेः; क्रुद्धाद्विभेम्यात्तधनू रथस्थः |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
भीष्म उवाच
नाहं मिथ्यावचो व्रूय़ां स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
३८
शृङ्ग्यु उवाच
नाहं मृषा प्रव्रवीमि स्वैरेष्वपि कुतः शपन् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
७८
शुक्र उवाच
नाहं मृषा व्रवीम्येतज्जरां प्राप्तोऽसि भूमिप |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
नाहं मृष्ये हतं द्रोणं सिंहद्विरदविक्रमम् |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
नाहं युधि निवर्तेय़मिति मे व्रतमाहितम् ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
नाहं युधि विमोक्तव्यो नाप्याचार्यः कथञ्चन ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११
शकुनिरु उवाच
नाहं युष्मान्प्रशंसामि पङ्कदिग्धान्रजस्वलान् |
७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
नाहं राजा भवान्राजा भवता परवानहम् |
९ क
सभा पर्व
अध्याय
५२
युधिष्ठिर उवाच
नाहं राज्ञो धृतराष्ट्रस्य शासना; न्न गन्तुमिच्छामि कवे दुरोदरम् |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय
४७
दुर्योधन उवाच
नाहं राज्यं प्रदास्यामि पाण्डवानां पितामह |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७५
मुचुकुन्द उवाच
नाहं राज्यं भवद्दत्तं भोक्तुमिच्छामि पार्थिव |
१८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२३
कुन्त्यु उवाच
नाहं राज्यफलं पुत्र कामय़े पुत्रनिर्जितम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
नाहं राज्यमनिर्दिष्टं कस्मैचिद्विदधाम्युत ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
युधिष्ठिर उवाच
नाहं राज्यसुखान्वेषी राज्यमिच्छाम्यपि क्षणम् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
नाहं लोभान्न कार्पण्यान्न भय़ान्नार्थकारणात् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
११
मैत्रेय़ उवाच
नाहं वक्ष्याम्यसूय़ा ते न ते शुश्रूषते सुतः |
३८ क
मौसल पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
नाहं विना यदुभिर्यादवानां; पुरीमिमां द्रष्टुमिहाद्य शक्तः ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
नाहं विभेमि कृष्णाभ्यां विजानन्नात्मनो वलम् ||
६९ ख
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
नाहं विभेमि सैरन्ध्रि गन्धर्वाणां शुचिस्मिते ||
२० ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
नाहं वृष्णिप्रवीरेण मधुभिश्चैव मातुल |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
कपिल उवाच
नाहं वेदान्विनिन्दामि न विवक्षामि कर्हिचित् |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
श्रीभगवानु उवाच
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया |
५३ क
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
नाहं व्रूय़ां पुनर्जातु क्षत्रिय़ोऽस्मीति भारत ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
नाहं शक्तः शापं प्रत्यादातुम् |
१३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
नाहं शक्यस्त्वय़ा वाचा विभीषय़ितुमाहवे ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
नाहं शक्यो रणे जेतुं सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ||
७० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
नाहं शक्योऽनुपाय़ेन हन्तुं भूतेन केनचित् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
च्यवन उवाच
नाहं शतसहस्रेण निमेय़ः पार्थिवर्षभ |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
नाहं शप्तः प्रतिशपामि किं चि; द्दमं द्वारं ह्यमृतस्येह वेद्मि |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११
भीष्म उवाच
नाहं शरीरेण वसामि देवि; नैवं मय़ा शक्यमिहाभिधातुम् |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
नाहं शोचामि तनय़ं निहतं पन्नगात्मजे |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
नाहं शोचामि दाशार्हं गोप्तारं जगतः प्रभुम् |
८६ क
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
नाहं श्वाचरिते मार्गे अवीर्यकृपणोचिते |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
नाहं सहाय़ः पार्थानां नापि दुर्योधनस्य वै |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
नाहं स्वेषां परेषां वा वुद्ध्या सञ्जय़ चिन्तय़न् |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
नाहंवादी न निर्द्वन्द्वो न यत्किञ्चनकारकः |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
नाहत्वा तं निवर्तिष्ये पुरीं द्वारवतीं प्रति |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
नाहत्वा मत्स्यघातीव प्राप्नोति परमां श्रिय़म् ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
नाहत्वा मत्स्यघातीव प्राप्नोति महतीं श्रिय़म् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
नाहत्वा युधि गाङ्गेय़ं निवर्तेय़ं तपोधनाः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
श्रीकृष्ण उवाच
नाहत्वा युधि गाङ्गेय़ं विजय़स्ते भविष्यति ||
९१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
नाहत्वा युधि तौ वीरावपय़ास्ये कथञ्चन ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
नाहत्वा विनिवर्तेऽहं कर्णमद्य रणाजिरात् |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
नाहत्वा संनिवर्तिष्ये त्वामद्य पुरुषाधम ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
नाहत्वा समरे कर्णं निवर्तिष्ये कथञ्चन ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
नाहत्वा समरे द्रोणो धृष्टद्युम्नं कथञ्चन |
५१ क