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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २३
कुन्त्यु उवाच
नाय़ं भीमोऽत्ययं गच्छेदिति चोद्धर्षणं कृतम् ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२१
पितामह उवाच
नाय़ं मानेन राजर्षे न वलेन न हिंसय़ा |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
विकृत उवाच
नाय़ं मे धारय़त्यत्र गम्यतां यत्र वाञ्छति ||
९९ ख
सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
नाय़ं युक्तः समाचारः पाण्डवेषु महात्मसु |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३१
भीष्म उवाच
नाय़ं लोकोऽस्ति न पर इति व्यवसितो जनः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
नाय़ं लोकोऽस्ति न परो न च पूर्वान्स तारय़ेत् |
६० क
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
नाय़ं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशय़ात्मनः ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
नाय़ं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
नाय़ं लोकोऽस्त्ययज्ञानां परश्चेति विनिश्चय़ः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
नाय़ं वक्ष्यति मिथ्येति प्रत्ययं कृतवांस्त्वय़ि ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय १३४
युधिष्ठिर उवाच
नाय़ं विभेत्युपक्रोशादधर्माद्वा पुरोचनः |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
नाय़ं वेदेषु विहितो विधिर्हस्त इति प्रभो |
१७ ख
वन पर्व
अध्याय १३५
यवक्रीरु उवाच
नाय़ं शक्यस्त्वय़ा वद्धुं महानोघः कथञ्चन |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
नाय़ं शुष्को न चार्द्रोऽय़ं न च शस्त्रमिदं तथा |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
नाय़ं संरक्षितुं कालः प्राणान्पुत्रोपजीविभिः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
नाय़कं नीतिकुशलं गुणषष्ट्या समन्वितम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
नाय़कं वा प्रमाणं वा यो वा स्यात्तत्र पूजितः |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
नाय़का मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्व्रवीमि ते ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५४
वासुदेव उवाच
नाय़कास्तव सेनाय़ामभिषिच्यन्तु सप्त वै ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
नाय़ज्वभिर्नानृतकैर्न वेदश्रुतिवर्जितैः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
नाय़मत्यन्तसंवासो लभ्यते जातु केनचित् |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०७
भीष्म उवाच
नाय़मत्यन्तसंवासो लव्धपूर्वो हि केनचित् ||
९ ग
सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
नाय़मर्हति वार्ष्णेय़स्तिष्ठत्स्विह महात्मसु |
१ क
वन पर्व
अध्याय ५६
वृहदश्व उवाच
नाय़मस्तीति दुःखार्ता व्रीडिता जग्मुरालय़ान् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
नाय़ासो विद्यते शक्र पश्यतो लोकविद्यया ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२४
भीष्म उवाच
नाय़ासय़ामि भर्तारं कुटुम्वार्थे च सर्वदा |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
नाय़ुद्धेन निवर्तेत सर्वैरपि मरुद्गणैः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
नाय़ुध्यत ततः कर्णः पुत्रस्य तव संमते ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३३
कापव्य उवाच
नाय़ुध्यमानो हन्तव्यो न च ग्राह्या वलात्स्त्रिय़ः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
निःक्षत्रिय़ां प्रतिश्रुत्य महीं शस्त्रमगृह्णत ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
भगीरथ उवाच
निःशङ्कमन्नमददं व्राह्मणेभ्यः; शतं सहस्राणि सदैव दानम् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
निःशल्यमेनं च चकार तूर्ण; मारोपय़च्चात्मरथं महात्मा |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
निःशव्दं चाप्रमेय़ं च तत्र जज्ञे पितामहः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
निःशव्दमभवच्चापि गङ्गाकूलं पुनर्नृप |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
निःशव्दमभवत्तूर्णं पुनरेव विशां पते ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
निःशव्दमासीत्सहसा पुनः शव्दो महानभूत् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
निःशव्दे च स्थिते तत्र ततो विप्रजने पुनः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
निःशव्दे तु कृते तस्मिन्धृष्टद्युम्नो विशां पते |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
निःशव्दैरल्पशव्दैश्च शोणितौघपरिप्लुतैः |
५८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३३
भीष्म उवाच
निःशेषं कुपिताः कुर्युरुग्राः सत्यपराक्रमाः ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय ६६
दुर्योधन उवाच
निःशेषं नः करिष्यन्ति क्रुद्धा ह्याशीविषा यथा ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
निःशेषकारिणां तात निःशेषकरणाद्भय़म् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३१
भीष्म उवाच
निःशेषकारिणो नित्यमशेषकरणाद्भय़म् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
कृप उवाच
निःशेषमस्त्रवीर्येण कुर्यातां भीमफल्गुनौ ||
४१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
निःशेषाणां तत्पदं यान्ति चान्ते; सर्वापदा ये सदृशा मनुष्याः ||
५२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
निःशेषान्समरे कुर्यात्पश्यतोर्नौ जनार्दन ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
राजो उवाच
निःशेषो हि कृतो वंशो मम तैः पापकर्मभिः ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
निःश्वसञ्जिह्मग इव कुम्भक्षिप्तो विशां पते ||
४५ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
निःश्वसन्क्रोधसन्दीप्तो विमुखः साय़कार्दितः ||
७३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
निःश्वसन्तं यथा नागं क्रोधसंरक्तलोचनम् ||
१८ ख