भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
निकृत्य रथिनामाजौ रथेषाश्च युगानि च |
४४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
निकृत्य रौक्मे पटुवर्मणी तय़ो; र्विदारय़ामास भुजौ महात्मा ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
धृतराष्ट्र उवाच
निकृत्या कोपितं मन्दैर्धर्मज्ञं धर्मचारिणम् ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
निकृत्या क्रोधसन्तप्तो नोन्मीलय़ति लोचने ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३
सात्यकिरु उवाच
निकृत्या जितवन्तस्ते किं नु तेषां परं शुभम् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
वासुदेव उवाच
निकृत्या धर्मराजं च द्यूते वञ्चितवानय़म् ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५९
युधिष्ठिर उवाच
निकृत्या निकृता नित्यं धृतराष्ट्रसुतैर्वय़म् |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२७
कर्ण उवाच
निकृत्या निकृताः पार्था विषय़ोगैश्च भारत |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
निकृत्या निकृतिप्रज्ञा हन्तव्या इति निश्चय़ः |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
निकृत्या निकृतिप्रज्ञो न मे जीवन्विमोक्ष्यते ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
धृतराष्ट्र उवाच
निकृत्या निकृतिप्रज्ञो राज्यं हृत्वा महात्मनाम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
निकृत्या निर्जिता देवैरसुराः पाण्डवर्षभ ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय
९
व्यास उवाच
निकृत्या निर्जिताश्चैव दुर्योधनवशानुगैः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
निकृत्या भ्रंशिता राज्याज्जनार्हा निर्जनं गताः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
निकृत्या मूलमेतद्धि येन पापकृतो जनाः ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
वासुदेव उवाच
निकृत्या यत्पराजैषीस्तस्मादसि हतो रणे ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
वासुदेव उवाच
निकृत्या राज्यहरणं वनवासं च पाण्डव |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
निकृत्या लभते राज्यमाहारमिव शल्यकः ||
५७ ख
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
निकृत्या वञ्चनाय़ोगैश्चरन्वैतंसिको यथा ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
निकृत्या वै दुराचारो यानि रत्नानि सौवलः |
२१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
निकृत्या हतवान्मन्दो नूनं कालो दुरत्ययः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
युधिष्ठिर उवाच
निकृत्या हन्यमानेषु वञ्चय़त्सु परस्परम् ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
६८
भीमसेन उवाच
निकृत्या हि धनं लव्ध्वा को विकत्थितुमर्हति ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
निकृत्योपचरन्वध्य एष धर्मः सनातनः ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३७
व्रह्मो उवाच
निकृन्त छिन्धि भिन्धीति परमर्मावकर्तनम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२१८
मार्कण्डेय़ उवाच
निकृन्तनं च शत्रूणां लोकानां चाभिरक्षणम् |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय
५९
विदुर उवाच
निकृन्तनं स्वस्य कण्ठस्य घोरं; तद्वद्वैरं मा खनीः पाण्डुपुत्रैः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
निकृन्तन्तमनीकानि शरदंष्ट्रं तरस्विनम् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
निकृन्तमाना मर्माणि दृढावरणभेदिनः |
५६ क
वन पर्व
अध्याय
१३४
वन्द्यु उवाच
निकृष्टभूता राजानो वत्सा अनदुहो यथा ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
निकृष्टमसिय़ुद्धं च वभूव कटुकोदय़म् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
निकृष्टय़ुद्धं संसक्तं महदासीत्सुदारुणम् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
निकृष्टय़ुद्धे द्रोणस्य नान्येषां सन्ति ते शराः ||
१५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
निकृष्य निशितं खड्गं गृहीत्वा च शरावरम् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
८७
धौम्य उवाच
निकेतः ख्याय़ते पुण्यो यत्र विश्रवसो मुनेः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२०७
अग्निरु उवाच
निक्षिपाम्यहमग्नित्वं त्वमग्निः प्रथमो भव |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
निक्षिपैतद्धनुस्तात प्राप्तोऽसि परमां गतिम् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
निक्षिप्तदण्डा भूतेषु दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
निक्षिप्तदण्डो निर्दण्डो न हिनस्ति कदाचन ||
५४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
सौदास उवाच
निक्षिप्तमेतद्भुवि पन्नगास्तु; रत्नं समासाद्य परामृषेय़ुः |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
निक्षिप्तशस्त्रे पतिते विमुक्तकवचध्वजे |
७२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
निक्षिप्य मानं दर्पं च वासुदेवसहोदरा |
१९ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
इन्द्र उवाच
निक्षिप्य मानुषं देहं गतास्ते भरतर्षभ |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२८८
वैशम्पाय़न उवाच
निक्षिप्य राजपुत्री तु तन्द्रीं मानं तथैव च |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
निक्षेपो मेऽश्वहृदय़ं त्वय़ि तिष्ठतु वाहुक |
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
निक्षेप्स्यन्ति च शस्त्राणि वाहनेभ्योऽवरुह्य ये |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय
१७०
गन्धर्व उवाच
निखातं तद्धि वै वित्तं केनचिद्भृगुवेश्मनि |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
निखिलमभिसमीक्ष्य निश्चितार्थं; परमसुखी विजहार वीतशोकः ||
५१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
निखिलां पृथिवीं सर्वां प्रशासन्तु हतद्विषः ||
८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
निखिलेन महाप्राज्ञ किं भूय़ः श्रोतुमिच्छसि ||
२७ ख