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वन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
तत्र वक्ष्याम्यहं दोषान्यैर्भवानवरोपितः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
तत्र वत्स्यसि कल्याणि सुखं सर्वगुणान्विता |
६ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र वर्णावरः स्नात्वा व्राह्मण्यं लभते नरः |
९५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
तत्र वासाय़ शय़ने कौश्ये सुखमुवास ह ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र वासो देवय़ान्याः शर्मिष्ठा जगृहे तदा |
६ क
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र वासो महद्दिव्यमुत्ससर्ज मनस्विनी ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
तत्र वाय़ुजलाहारा चचार निय़मं पुनः ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
तत्र विक्रोशतीनां च रुदतीनां च सर्वशः |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
तत्र विज्ञानसंय़ुक्ता त्रिविधा वेदना ध्रुवा |
११ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र विद्यागणाः सर्वे ये केचित्कविभिः कृताः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र विद्यातपोनित्या व्राह्मणा वेदपारगाः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र विद्याव्रतस्नातः कौमारं व्रतमास्थितः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र विद्रुतसङ्घानि हतय़ूथपतीनि च |
२० क
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र विश्राव्य विस्पष्टं नाम राक्षसपुङ्गवः |
९ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
तत्र विश्वेश्वरं दृष्ट्वा देव्या सह महाद्युतिम् |
११६ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र विष्णुपदे स्नात्वा अर्चय़ित्वा च वामनम् |
८७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४६
सञ्जय़ उवाच
तत्र वीरो महेष्वासः सात्यकिर्युद्धदुर्मदः |
६ क
विराट पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र वुद्धिं प्रणेष्यामि पाण्डवान्प्रति भारत |
८ क
आदि पर्व
अध्याय ३३
सूत उवाच
तत्र वुद्धिं प्रवक्ष्यामो यथा यज्ञो निवर्तते ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४०
व्रह्मो उवाच
तत्र वुद्धिमतां लोकाः संन्यासनिरताश्च ये |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
तत्र वुद्धिर्हि दुर्धर्षा मनः साधर्म्यमुच्यते |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
तत्र वुद्धेः शरीरस्थं मनो नामार्थचिन्तकम् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
तत्र वृक्षा मधुफला नित्यपुष्पफलोपगाः |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
तत्र वृद्धः पुरावृत्ताः कथाः काश्चिद्द्विजोत्तमः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९८
जमदग्निरु उवाच
तत्र वेत्स्यामि सूर्य त्वां न मेऽत्रास्ति विचारणा ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
तत्र वेदविदः प्राज्ञा गाम्भीर्ये सागरोपमाः |
७३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र वेदविदो राजंश्चक्रुः कर्माणि याजकाः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
तत्र वेदविदो विप्रानपश्यद्व्राह्मणर्षभान् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
तत्र वेदान्प्रनष्टांस्तु मुनेरङ्गिरसः सुतः |
४४ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
तत्र वेदाश्च यज्ञाश्च मूर्तिमन्तो युधिष्ठिर |
७३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
तत्र वेदिं च भूमिं च देवताय़तनानि च |
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र वै दक्षिणाकाले व्रह्मघोषो दिवं गतः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११९
सञ्जय़ उवाच
तत्र वै देवकीं देवीं वसुदेवार्थमाप्तवान् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय १९१
भीष्म उवाच
तत्र वै निश्चितं तेषामभूद्राज्ञां महात्मनाम् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७७
भगवानु उवाच
तत्र वै पौरुषं व्रूय़ुरासेकं यत्नकारितम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय १७८
सर्प उवाच
तत्र वै मानुषाल्लोकाद्दानादिभिरतन्द्रितः |
१० क
वन पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र वै लोमशं राजा पप्रच्छ वदतां वरः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
तत्र वै वाय़वो वान्ति दिग्भ्यः सर्वाभ्य एव च |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २१
भीष्म उवाच
तत्र वै शय़ने दिव्ये तस्य तस्याश्च कल्पिते ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र वैतरणी पुण्या नदी पापप्रमोचनी ||
७० ख
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
तत्र वैवर्ण्यवर्णौ च सुपुण्यौ मनुजाधिप ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्यास उवाच
तत्र वैवस्वतो राजञ्शामित्रमकरोत्तदा ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र वैश्रवणावासं ददर्श भरतर्षभः |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
तत्र व्यङ्गीकृताः पेतुः शतशोऽथ रथद्विपाः ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र व्यालमृगान्सौम्यान्पश्यन्प्रीतिमवाप सः ||
१८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३१०
भीष्म उवाच
तत्र व्रह्मर्षय़श्चैव सर्वे देवर्षय़स्तथा |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र व्रह्मा च रुद्रश्च शक्रश्चापि सुरेश्वरः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
तत्र व्रह्मा समभवत्स तस्यैव प्रसादजः ||
१५ ग
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र व्रह्मा स्वय़ं नित्यं देवैः सह महीपते |
१४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
तत्र शक्योपमा कर्तुमन्यत्र तु न विद्यते ||
३९ ख