सभा पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
नित्यमाज्ञापय़न्भासि दिवि देवेश्वरो यथा ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
नित्यमाराधय़िष्यंस्तां युवा यौवनगोऽऽमुखे |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
नित्यमार्यामहं कुन्तीं वीरसूं सत्यवादिनीम् |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
नित्यमावसते राजन्नरनारीसमावृतम् |
५४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
नित्यमाशंसते द्रोणः कच्चित्स्यात्कुशली नृपः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३८
वैशम्पाय़न उवाच
नित्यमुग्रतपास्त्वं हि ततः पृच्छामि ते पुनः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
नित्यमुत्तमकर्माणमुत्तमौजसमाहवे ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
नित्यमुद्यतदण्डः स्यादाचरेच्चाप्रमादतः |
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
नित्यमुद्यतदण्डः स्यान्नित्यं विवृतपौरुषः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
नित्यमुद्यतदण्डश्च भवेन्मृत्युरिवारिषु |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
नित्यमुद्यतदण्डश्च हन्ति भूतगणान्नरः ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
नित्यमुद्यतदण्डस्य भृशमुद्विजते जनः |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
नित्यमुद्विजते चास्य तेजसा पाकशासनः ||
३२ ग
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
नित्यमुद्विजते राजा कथं नेय़ादिमामिति ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
नित्यमेतद्विजानीहि सोमः षोडशमी कला ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
नित्यमेतान्नमस्यामि कृष्ण लोककरानृषीन् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
नित्यमेते हि पश्यन्ति देहिनां देहसंश्रिताः |
७३ क
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
नित्यमेव प्रिय़ं कार्यं राज्ञो विषय़वासिभिः |
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८३
भृगुरु उवाच
नित्यमेव सुखं स्वर्गे सुखं दुःखमिहोभय़म् |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
नित्यमेव सृगालस्त्वं नित्यं सिंहो धनञ्जय़ः |
५० क
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
नित्यमेवान्तरप्रेक्षी भीमस्यासीन्महात्मनः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
नित्यमेवाभिवर्तन्ते गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ||
५१ ग
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
नित्यमेवाह दुष्टात्मा भार्या मम भवेति वै ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
नित्यमेवेह कर्तव्या एष धर्मः सनातनः ||
३० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
नित्ययज्ञोपवीती स्याच्छुक्लवासाः शुचिव्रतः |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
नित्ययुक्तः शुचिर्भूत्वा प्राप्नोत्यात्मानमात्मना ||
१५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
नित्ययुक्ता महावाहो वर्धन्ते सर्वतो गणाः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
नित्ययुक्ताश्च ते भृत्या भवन्तु रणकोविदाः |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
नित्ययुक्तो रिपून्सर्वान्वीक्षसे रिपुसूदन ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८२
भृगुरु उवाच
नित्यव्रती सत्यपरः स वै व्राह्मण उच्यते ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२७८
नारद उवाच
नित्यशश्चार्जवं तस्मिन्स्थितिस्तस्यैव च ध्रुवा |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
नित्यशश्चोद्विजेत्तस्मात्सर्पाद्वेश्मगतादिव ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
७७
वृहदश्व उवाच
नित्यशो हि स्मरामि त्वां प्रतीक्षामि च नैषध |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
नित्यस्नाय़ी भवेद्दक्षः सन्ध्ये तु द्वे जपन्द्विजः |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
व्राह्मण उवाच
नित्यस्य चैतस्य भवन्ति नित्या; निरीक्षमाणस्य वहून्स्वभावान् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
नित्यस्वाध्याय़ता धर्मो धर्मो यज्ञः सनातनः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
नित्यस्वाध्याय़िता धर्मो व्रह्मचर्याश्रमस्तथा ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
नित्यहृष्टाः सुमनसो भारतैरभिरक्षिताः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
नित्याञ्जलिकृतान्व्रह्म जपतः प्रागुदङ्मुखान् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
१२७
सोमक उवाच
नित्यातुरत्वाद्भूतानां शोक एवैकपुत्रता ||
१२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
नित्यानन्दप्रमुदिता वागीशा वीतमत्सराः ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
नित्यानि पाण्डवश्रेष्ठे स जीय़ेत कथं रणे ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९८
कण्व उवाच
नित्यानुषक्तवैरा हि भ्रातरो देवदानवाः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
नित्यान्यासन्महासत्त्वे शन्तनौ पुरुषर्षभे ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
नित्याभित्वरितानेव त्वरय़ामास पाण्डवान् ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
गौतम्यु उवाच
नित्याय़स्तो वालजनो न चास्ति; धर्मो ह्येष प्रभवाम्यस्य नाहम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
नित्ये महति चात्मानमवस्थापय़ते नृप ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
नित्येन व्रह्मचर्येण लिङ्गमस्य यदा स्थितम् |
८३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
नित्येन व्रह्मचर्येण लिङ्गमस्य यदा स्थितम् |
१५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
नित्येऽस्मिन्पञ्चके वर्गे नित्ये चात्मनि यो नरः |
१३ क