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आदि पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
आचार्यः कलशाज्जातः शरस्तम्वाद्गुरुः कृपः |
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
आचार्यः क्षिप्रहस्तश्च विजय़ी च सदा युधि |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२५
दुर्योधन उवाच
आचार्यः पाण्डुपुत्राणामनुजानातु नो भवान् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
दुर्योधन उवाच
आचार्यः पाण्डुपुत्रान्वै पुत्रवत्परिरक्षति |
७१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
आचार्यः प्लाविता तस्य ज्ञानं प्लव इहोच्यते |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २८
भीष्म उवाच
आचार्यः सर्वभूतानां शास्ता किं प्रहरिष्यति ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सात्यकिरु उवाच
आचार्यककृतं मार्गं दर्शय़िष्यामि संय़ुगे ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६५
इन्द्र उवाच
आचार्यगुरुशुश्रूषा तथैवाश्रमवासिनाम् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
युधिष्ठिर उवाच
आचार्यगुरुशुश्रूषास्वनुक्रोशानुकम्पने ||
६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
आचार्यघातिनां लोका न सन्ति कुलपांसन |
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
भीष्म उवाच
आचार्यता मानिता मे निर्मर्यादे ह्यपि त्वय़ि |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
आचार्यत्वं धनुर्वेदे गतः परमतत्त्ववित् |
९७ क
आदि पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
आचार्यधनदानार्थं द्रोणेन सहिता यय़ुः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
आचार्यपितृभार्यार्थं स्वाध्याय़ार्थमथापि वा ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
आचार्यपुत्र दुर्वुद्धे किमन्यैर्निहतैस्तव |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
दुर्योधन उवाच
आचार्यपुत्र यद्येतद्द्विरस्त्रं न प्रय़ुज्यते |
३० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
आचार्यपुत्र शस्त्रेण जहि मा मा चिरं कृथाः |
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय ४६
भीष्म उवाच
आचार्यपुत्रः क्षमतां नाय़ं कालः स्वभेदने |
१० क
विराट पर्व
अध्याय ४६
भीष्म उवाच
आचार्यपुत्रः क्षमतां महत्कार्यमुपस्थितम् ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
आचार्यपुत्रः सहसा पाण्डवं प्रत्यवारय़त् ||
६५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
आचार्यपुत्रस्तां सेनां वाणवृष्ट्याभ्यवीवृषत् ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
आचार्यपुत्रे निहते हस्तिशिक्षाविशारदे |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
आचार्यपुत्रेण हते नीले ज्वलिततेजसि ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७२
धृतराष्ट्र उवाच
आचार्यपुत्रो मानार्हो वलवांश्चापि सञ्जय़ |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
आचार्यपुत्रो मेधावी वाक्यज्ञो वाक्यमाददे ||
११ ग
विराट पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
आचार्यपुत्रो यः शूरः सर्वशस्त्रभृतामपि |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
आचार्यप्रमुखान्पार्थ आय़ात्येष हि सात्यकिः ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
आचार्यप्रवराद्वापि भारद्वाजान्महावलात् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
आचार्यमथ वाप्येनं तथाय़ुर्विन्दते महत् ||
६७ ख
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
आचार्यमुख्यः समरे द्रोणः शस्त्रभृतां वरः |
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
आचार्यमुपसङ्गम्य कृपं शल्यं च मारिष |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
आचार्यमुपसङ्गम्य भीष्मः शान्तनवोऽव्रवीत् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमव्रवीत् ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
आचार्यमृत्विजं चैव गुरुं वृद्धजनं तथा |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
आचार्यमृत्विजं चैव संय़ुक्तं च युधिष्ठिर |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५
वासुदेव उवाच
आचार्ययोः सखा चासि द्रोणस्य च कृपस्य च ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४४
सनत्सुजात उवाच
आचार्ययोनिमिह ये प्रविश्य; भूत्वा गर्भं व्रह्मचर्यं चरन्ति |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
आचार्यवचनेनाथ कृतस्वस्त्ययनो युवा |
८ क
विराट पर्व
अध्याय ६७
अर्जुन उवाच
आचार्यवच्च मां नित्यं मन्यते दुहिता तव ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
आचार्यवन्महेष्वासः कर्णः पर्यचरद्रणे ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
आचार्यवरमुख्यानां मध्ये क्रीडन्मधूद्वहः ||
१५६ ख
विराट पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
आचार्यवाक्योपरमे तद्वाक्यमभिसन्दधत् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
सञ्जय़ उवाच
आचार्यविहितं व्यूहं भिन्नं देवैः सुदुर्भिदम् ||
२ ग
आदि पर्व
अध्याय १५४
व्राह्मण उवाच
आचार्यवेतनं किञ्चिद्धृदि सम्परिवर्तते |
१९ क
स्त्री पर्व
अध्याय २१
गान्धार्यु उवाच
आचार्यशापोऽनुगतो ध्रुवं त्वां; यदग्रसच्चक्रमिय़ं धरा ते |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४४
सनत्सुजात उवाच
आचार्यशास्ता या जातिः सा सत्या साजरामरा ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०८
भीष्म उवाच
आचार्यशास्ता या जातिः सा सत्या साजरामरा ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०९
भीष्म उवाच
आचार्यशिष्टा या जातिः सा दिव्या साजरामरा ||
१७ ग
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
आचार्यशिष्यावजितौ कृतविद्यौ मनस्विनौ ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
आचार्यशिष्यौ राजेन्द्र कृतप्रहरणौ युधि ||
२१ ख