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भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
निपेतुः सहसा भूमौ वेदय़ाना महद्भय़म् ||
५१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
निपेतुः सहसा राजन्सुवेगाभिहता भुवि ||
१७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
निपेतुरनिशं भूमौ छिन्नपक्षा इवाद्रय़ः ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
निपेतुरप्युत्तमपुष्पवृष्टय़ः; सुरूपगन्धाः पवनेरिताः शिवाः ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
निपेतुराजौ रुधिरप्रदिग्धा; स्ते ताडिताः शक्रसुतेन राजन् |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
निपेतुरुर्व्यां च तथा विनदन्तो महारवान् ||
४७ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
निपेतुरुर्व्यां व्यसवः प्रपातिता; स्तथा यथा वज्रहता महाचलाः ||
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
निपेतुरुर्व्यां समरे कर्णसाय़कपीडिताः |
५४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
निपेतुरुर्व्यां सहसा वातनुन्ना इव द्रुमाः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
निपेतुरुर्व्यां सहिता नादय़न्तो वसुन्धराम् ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
निपेतुर्दिक्षु सर्वासु गजाश्वरथय़ोधिनाम् ||
१२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
निपेतुर्द्विरदा भूमौ द्विशृङ्गा इव पर्वताः ||
११६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३६
सञ्जय़ उवाच
निपेतुर्द्विरदा भूमौ द्विशृङ्गा इव पर्वताः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
निपेतुर्युधि सम्भग्नाः सय़ोधाः सध्वजा रथाः ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
निपेतुर्विमलाः शक्त्यो वीरवाहुभिरर्पिताः |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
निपेतुस्तुमुले तस्मिंश्छिन्नपक्षा इवाद्रय़ः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय ५०
वृहदश्व उवाच
निपेतुस्ते गरुत्मन्तः सा ददर्शाथ तान्खगान् ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
निमग्नं तं रथं मत्वा नेदुः संशप्तका मुदा ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
निमग्नं भरतश्रेष्ठ पापकृन्नरके यथा ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
निमग्नाः परलोकाय़ सवाजिरथकुञ्जराः ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५४
भीम उवाच
निमग्नो वा समरे भीमसेन; एकः कुरून्वा समरे विजेता ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
निमज्जतस्तानथ कर्णसागरे; विपन्ननावो वणिजो यथार्णवे |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
निमज्जन्तीं तदा राजंस्तेनोर्वीति मही स्मृता ||
६४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
निमज्जमानं राधेय़मुज्जह्रुः सात्यकार्णवात् ||
६७ ख
वन पर्व
अध्याय २८२
ऋषय़ ऊचुः
निमज्जमानं व्यसनैरभिद्रुतं; कुलं नरेन्द्रस्य तमोमय़े ह्रदे |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
निमज्जमानमुद्धृत्य कश्चिद्राजा निशाचरम् |
६९ क
सभा पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
निमज्जिष्यति यं दृष्ट्वा सोऽस्य मृत्युर्भविष्यति ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
निमज्जय़न्तं समरे परवीरापहारिणम् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय २४२
वैशम्पाय़न उवाच
निमन्त्रणार्थं दूतांश्च प्रेषय़ामास शीघ्रगान् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
निमन्त्र्यन्तामासनैश्च सत्कारेण च भूय़सा ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
निमन्त्र्यश्च भवेद्भोगैरवृत्त्या चेत्तदाचरेत् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २४२
वैशम्पाय़न उवाच
निमन्त्रय़ यथान्याय़ं विप्रांस्तस्मिन्महावने ||
७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २६४
भीष्म उवाच
निमन्त्रय़न्ती प्रत्युक्ता न हन्यां सहवासिनम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
निमन्त्रय़ामास तदा फलमूलाशनादिभिः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
निमन्त्रय़ेत सान्त्वेन संमानेन तितिक्षय़ा |
५५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
निमन्त्रय़ेथाः कौन्तेय़ कामैश्चान्यैर्द्विजोत्तमान् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
निमन्त्रय़ेथाः कौरव्य सर्वकामसुखावहैः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
निमित्तं तत्र शकुनिरहं दुःशासनस्तथा |
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
निमित्तं मन्यमानास्तु परिणम्य महागजाः |
५६ क
आदि पर्व
अध्याय ४७
सूत उवाच
निमित्तं महदुत्पन्नं यज्ञविघ्नकरं तदा ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ७३
वृहदश्व उवाच
निमित्तं यत्तदा दृष्टं वाहुके दिव्यमानुषम् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ५३
सूत उवाच
निमित्तं व्राह्मण इति तस्मै वित्तं ददौ वहु |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १७२
गन्धर्व उवाच
निमित्तभूतस्त्वं चात्र क्रतौ वासिष्ठनन्दन |
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
निमित्तभूता हि वय़ं कर्मणोऽस्य द्विजोत्तम ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
निमित्तमभवद्द्रोणः सपुत्रस्तत्र कर्मणि ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
निमित्तमरणास्त्वन्ये चन्द्रसूर्यौ मही जलम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
निमित्तमवलिप्ता वै नृशंसाश्चैव नित्यदा ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय १३६
भरद्वाज उवाच
निमित्तमस्य महिषैर्भेदय़ामास वीर्यवान् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
निमित्तमात्रं तावत्र सर्वप्राणिवरप्रदौ ||
१७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
निमित्तमात्रं वय़मत्र सूत; दग्धारय़ः केशवफल्गुनाभ्याम् |
२ क