द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
न चाप्यसह्यं भीमस्य विद्यते भुवि किञ्चन |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
न चाप्यस्य गिरेर्विप्रा न नद्या देवताप्यहम् ||
७० ख
विराट पर्व
अध्याय
८
द्रौपद्यु उवाच
न चाप्यहं चालय़ितुं शक्या केनचिदङ्गने |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय
१३
द्रौपद्यु उवाच
न चाप्यहं त्वय़ा शक्या गन्धर्वाः पतय़ो मम |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
न चाप्यहं लिप्समानः परैमि; न चैव किञ्चिद्विषमेण यामि ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
११६
माद्र्यु उवाच
न चाप्यहं वर्तय़न्ती निर्विशेषं सुतेषु ते |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
न चाप्यहं वृथा भूय़ो दारान्कर्तुमिहोत्सहे |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९४
भीष्म उवाच
न चाप्यहं वेद परं पुराणं; मिथ्याप्रवृत्तिं च कथं नु कुर्याम् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८८
द्रुपद उवाच
न चाप्याचरितः पूर्वैरय़ं धर्मो महात्मभिः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
न चाप्युत्सहते दातुं वित्तरक्षी महाजनात् ||
१४३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२
विदुर उवाच
न चाप्येतान्हतान्युद्धे राजञ्शोचितुमर्हसि |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
न चाप्येवं त्वय़ा भूय़ः क्षेप्तव्या व्रह्मवादिनः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
न चाफलं सत्पुरुषेण सङ्गतं; ततः सतां संनिवसेत्समागमे ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
न चाभावय़तः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ||
६६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
न चाभिकामान्कौरव्य विधाय़ हृदय़े पुमान् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
२०४
वैशम्पाय़न उवाच
न चाभिद्यन्त ते सार्वे तदान्योन्येन भारत ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
न चाभिनन्दामि तवाधिराज्यं; यतस्त्वमक्षेष्वहिताय़ सक्तः |
८५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
न चाभिमन्तव्यमिति प्रचोदिताः; परे त्वदीय़ाश्च तदावतस्थिरे |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
न चाभिमन्यते किञ्चिन्न च वुध्यति काष्ठवत् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
न चाभिमन्युं पश्यामि न च मां प्रतिनन्दथ ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४६
भीष्म उवाच
न चाभिलषसे किञ्चिदाहारं धर्मवत्सल ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
न चाभीक्ष्णं शिरः स्नाय़ात्तथास्याय़ुर्न रिष्यते ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
न चाभ्युदितशाय़ी स्यात्प्राय़श्चित्ती तथा भवेत् ||
६६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
न चामङ्गलकेतोः स प्रहरेदापगासुतः ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
न चामुच्यत शापाद्वै क्षय़ं चैवाभ्यगच्छत ||
५७ ख
वन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
न चामुद्रोऽभिनिर्याति न चामुद्रः प्रवेश्यते |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
गौतम्यु उवाच
न चामृत्युर्भविता वै हतेऽस्मि; न्को वात्ययः स्यादहतेऽस्मिञ्जनस्य |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८
शल्य उवाच
न चारिजं भय़ं तस्य न चापुत्रो भवेन्नरः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२३
वासुदेव उवाच
न चारित्रनिमित्तोऽस्याहङ्कारो देहपातनः |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
३७
कर्ण उवाच
न चार्जुनः कला पूर्णा मम दुर्योधनस्य वा ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१९
नमुचिरु उवाच
न चार्थकृच्छ्रव्यसनेषु शोचति; स्थितः प्रकृत्या हिमवानिवाचलः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
न चार्थलोभात्प्रजहासि धर्मं; तस्मात्स्वभावादसि धर्मराजः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
न चार्थवद्धः कर्माणि धर्मं वा कञ्चिदाचरेत् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
न चार्थहेतोर्धर्मज्ञौ वक्ष्यतः पक्षसंश्रितम् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
११०
गालव उवाच
न चार्थेनापि महता शक्यमेतद्व्यपोहितुम् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
न चार्थो भैक्षचर्येण नापि क्लैव्येन कर्हिचित् |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३०
भीष्म उवाच
न चार्षात्सदृशं किञ्चित्प्रमाणं विद्यते क्वचित् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
न चालभन्त ते शर्म रोधःसु विषमेषु च |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
जनमेजय़ उवाच
न चाल्पतेजसमृषिं वेद्मि नारदमव्ययम् |
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
न चावतारय़ामास चेष्टमानो यथावलम् ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
न चावमन्ता दाता च वेदवेदाङ्गपारगः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
न चावमान्या दर्पात्ते वाग्विषा भृशकोपनाः ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
न चावाभ्यामृतेऽन्योऽस्ति शक्तस्तं प्रतिवाधितुम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
न चावुधानामपि ते द्विजातय़ो; ये ज्ञानमेतन्नृपतेऽनुरक्ताः ||
१०८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
न चाव्यथत धर्मात्मा वासविः परवीरहा ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
न चाशकच्चालय़ितुं भीमः पुच्छं महाकपेः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
भीष्म उवाच
न चाशकत्तां देवेन्द्रो व्रह्महत्यां व्यपोहितुम् ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५२
वासुदेव उवाच
न चाशक्यन्त सन्धातुं तेऽधर्मरुचय़ो मय़ा ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११३
नारद उवाच
न चाशामस्य विप्रर्षेर्वितथां कर्तुमुत्सहे ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
न चाशिष्याय़ाव्रताय़ोपकुर्या; न्नाश्रद्दधानाय़ न वक्रवुद्धय़े |
२२ क