chevron_left  निमित्तवेधिनांarrow_drop_down
भीष्म पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
निमित्तवेधिनां राजञ्शरानुत्सृजतां भृशम् ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९४
राम उवाच
निमित्तवेधी स मुनिरिषीकाभिः समर्पय़त् ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
निमित्तानि च घोराणि तथोत्पाताः सुदारुणाः ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
निमित्तानि च धन्यानि पार्थस्य प्रशशंसिरे |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
निमित्तानि च धन्यानि यथा भीम वदन्ति मे ||
७१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
निमित्तानि निमित्तज्ञः सर्वतो वीक्ष्य वीर्यवान् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
निमित्तानि हि सर्वाणि तथा प्रादुर्भवन्ति मे ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
निमित्ते दूरपातित्वे लघुत्वे दृढवेधने |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
निमित्तेषु महावाहो दारुणं प्राणिनाशनम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
निमित्तैस्तामहं सीतामुपलभ्य पृथग्विधैः |
५९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
निमिस्तु कृत्वा शौचानि विधिदृष्टेन कर्मणा |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२६
व्यास उवाच
निमी राष्ट्रं च वैदेहो जामदग्न्यो वसुन्धराम् |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
निमीलिताक्षं तं वीरं साश्रुकण्ठस्तदा वृषः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
निमीलिताक्षमत्यर्थमुदभ्राम्यत्समन्ततः ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
निमीलिताक्षाः क्षिण्वन्तो भृशमन्योन्यमर्दिताः |
५८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
भीष्म उवाच
निमीलिते भूतपतौ नष्टसूर्य इवाभवत् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
निमील्य नय़ने राजन्पदातिर्द्रोणमभ्ययात् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
निमीलय़त चात्रैव रणभूमौ मुहूर्तकम् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
निमीलय़स्व नय़ने जटा यावद्विशामि ते ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
निमे सङ्कल्पितस्तेऽय़ं पितृय़ज्ञस्तपोधनः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
निमेश्चाप्यभवत्पुत्रः श्रीमान्नाम श्रिय़ा वृतः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
निमेषमात्रं तमृषिप्रसाद; मवाप्य पाञ्चालकरूषमत्स्यान् |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४८
व्रह्मो उवाच
निमेषमात्रमपि चेत्संय़म्यात्मानमात्मनि |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
नारद उवाच
निमेषमात्रमपि हि वय़ो गच्छन्न तिष्ठति |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
निमेषमात्रेण च तज्ज्योतिरन्तरधीय़त |
४१ क
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
निमेषमात्रेण शतं जघान समरे तदा ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
निमेषमात्रेणासाद्य कुन्तीपुत्रोऽभ्यवाकिरत् ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
निमेषात्पाण्डवीं सेनां क्षपय़ेम नृपोत्तम ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २३९
वैशम्पाय़न उवाच
निमेषादगमच्चापि यत्र राजा सुय़ोधनः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय ३६
भीमसेन उवाच
निमेषादपि कौन्तेय़ यस्याय़ुरपचीय़ते |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
निमेषान्तरमात्रेण आत्तमात्तं महारणे ||
४८ ग
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
निमेषान्तरमात्रेण तथैव विजय़ोऽर्जुनः ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
निमेषान्तरमात्रेण भारद्वाजोऽपरं धनुः |
३४ क
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
निमेषान्तरमात्रेण भीष्मोऽन्यत्कार्मुकं रणे |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
निमेषान्तरमात्रेण मुञ्चन्दूरं च पातय़न् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५
शल्य उवाच
निमेषान्तरमात्रेण वृहस्पतिमुपागमत् ||
२८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
निमेषान्तरमात्रेण शुकाभिपतनं यय़ौ ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
निमेषान्तरमात्रेण सज्यं चक्रे पिता तव ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
निमेषान्तरमात्रेण सज्यं चक्रे पिता तव ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
निमेषान्तरमात्रेण साश्वसूतरथद्विपाम् |
११४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
निमेषार्धाच्च कौन्तेय़ं भीष्मः शान्तनवो युधि |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
निमेषोन्मेषफेनेन अहोरात्रजवेन च |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
निम्ने कृषिं करिष्यन्ति योक्ष्यन्ति धुरि धेनुकाः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७९
भीष्म उवाच
निमय़ेत्पक्वमामेन भोजनार्थाय़ भारत ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
निरता येन भावेन तत्र मे शृणु कारणम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
निरताहं सदा सत्ये भर्तॄणामुपसेवने |
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
निरध्यक्षांस्तु कौन्तेय़ कीर्तय़िष्यामि तानपि ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
भीष्म उवाच
निरन्तरं च मिश्रं च फलते कर्म पार्थिव |
१६ क