शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
निरीक्ष्य चासुरेन्द्रौ तौ ततो युद्धे मनो दधे |
६३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
निरीक्ष्य तव पुत्राणां हाहाकृतमभूद्वलम् ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
निरीक्ष्य तां सभां रम्यामिदं वचनमव्रवीत् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
निरीक्ष्य भगवान्देवीमुमां मां च जगद्धितः |
४९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
निरीक्ष्यमाणा अन्योन्यं द्रौणिं दृष्ट्वा प्रविव्यथुः ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
निरीहस्त्यजति प्राणान्व्राह्मीं संश्रय़ते तनुम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
निरुक्तं कर्मजानां च शृणुष्व प्रय़तोऽनघ |
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
निरुक्तं वेदविदुषो ये च शव्दार्थचिन्तकाः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ||
२०९ ख
आदि पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२९
व्यास उवाच
निरुक्तमेतय़ोरेतत्स्वभावपरभावय़ोः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४८
भीष्म उवाच
निरुच्छ्वासमिवोन्नद्धं त्रैलोक्यमभवन्नृप ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
निरुच्छ्वासोऽभवच्चैव संनिरुद्धो महात्मना |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
निरुच्यन्ते महत्त्वाच्च विभुत्वात्कर्मभिस्तथा ||
७८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
निरुच्यन्ते महत्त्वाच्च विभुत्वात्कर्मभिस्तथा ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
निरुच्यमानान्निय़तो यच्चान्यदभिवाञ्छसि ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
निरुत्साहश्च सम्प्राप्तुं श्रिय़मक्षत्रिय़ो यथा |
१०० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
निरुत्साहा भविष्यन्ति भग्नदंष्ट्रा इवोरगाः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
निरुत्साहान्रणे चक्रे विमुखान्विपराक्रमान् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
निरुत्साहौ भविष्येते भ्रष्टवीर्यपराक्रमौ |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
निरुद्धः पार्षतस्तेन गौतमेन वलीय़सा |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भृगुरु उवाच
निरुद्धमेतदाकाशमप्रमेय़ं सुरैरपि ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
निरुद्धाश्च वय़ं सर्वे सैन्धवेन दुरात्मना |
४० क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
निरुद्धे तत्र मार्गे तु शरसङ्घैः समन्ततः |
७२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
निरुद्यमा भविष्यन्ति पाण्डवाः सोमकैः सह ||
७ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
निरुद्यमास्तस्थुरमित्रमर्दना; यथेन्द्रिय़ार्थात्मवता पराजिताः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०४
नारद उवाच
निरुद्योगौ तदा भूत्वा विजह्रातेऽमराविव ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१९३
उत्तङ्क उवाच
निरुद्विग्नस्तपश्चर्तुं न हि शक्नोमि पार्थिव |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१९३
उत्तङ्क उवाच
निरुद्विग्ना वय़ं राजंस्त्वत्प्रसादाद्वसेमहि ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
निरुद्वेगो वृहद्वादी न निन्दामुपलप्स्यते ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
निरुध्य चेन्द्रिय़ग्रामं मनः संरुध्य चानघ |
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
निरुन्धताभिद्रवताच्युतार्जुनौ; श्रमेण संय़ोजय़ताशु सर्वतः |
५२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
निरुष्य कस्माद्वर्षपूगान्वनेषु; युय़ुत्ससे पाण्डव हीनकालम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
निरुष्य तत्र सुचिरमेवं वह्निर्वशं गतः |
४८ क
विराट पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
निरुष्य हि वने वासं कृत्वा कर्मातिमानुषम् |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
निरूष्मा स निरुच्छ्वासो निःश्रीको गतचेतनः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
निरोङ्कारवषट्काराः स्वधास्वाहाविवर्जिताः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
निरोङ्कारेण यद्भुक्तं सशस्त्रेण च भारत |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
निरोजसां निष्क्रमणं मलानां च पृथक्पृथक् ||
३८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
निरोत्स्यामि च पाञ्चालान्सहितान्पाण्डुसृञ्जय़ैः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
निरोद्धव्याः सदा राज्ञा क्षीरिणश्च महीरुहाः ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
निर्गच्छध्वं पाण्डवेय़ाः पुष्येण सहिता मय़ा ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
निर्गच्छन्त्यवशा जीवाः कालवन्धनवन्धनाः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
निर्गच्छमानय़ोः सङ्ख्ये सागरप्रतिमो महान् ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
निर्गम्यान्तःपुरद्वारात्समुत्सृज्याशु जग्मतुः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
निर्गुणं चेश्वरं नित्यमधिष्ठातारमेव च ||
४३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४७
व्रह्मो उवाच
निर्गुणं नित्यमद्वन्द्वं प्रशमेनैव गच्छति ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३८
व्रह्मो उवाच
निर्गुणं निर्गुणा भूत्वा प्रविशन्ति सनातनम् ||
२५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
निर्गुणं निर्मलं व्रह्म यत्र तिष्ठति स द्विजः ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
निर्गुणं प्रथमं दृष्ट्वा तादृग्भवति मैथिल ||
३९ ग