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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं तु मे मणिर्दिव्यः समानीतो विशां पते |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं तु यत्कृते यूय़ं मय़ा शप्ताः स वत्स्यति |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
अय़ं तु सदृशो वीरः शल्यः समितिशोभनः |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय ५
कर्ण उवाच
अय़ं तु सर्वय़ोधानामाचार्यः स्थविरो गुरुः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय २६
दुर्योधन उवाच
अय़ं ते कर्ण सारथ्यं मद्रराजः करिष्यति |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं ते पुण्डरीकाक्ष दुःशासनकरोद्धृतः |
३६ क
स्त्री पर्व
अध्याय २०
गान्धार्यु उवाच
अय़ं ते पुण्डरीकाक्ष सदृशाक्षो निपातितः ||
९ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं ते पूर्वजो भ्राता कौन्तेय़ः पावकद्युतिः |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय ४५
अश्वत्थामो उवाच
अय़ं ते मातुलः प्राज्ञः क्षत्रधर्मस्य कोविदः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २८१
यम उवाच
अय़ं ते सत्यवान्भर्ता क्षीणाय़ुः पार्थिवात्मजः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं तेषां समस्तानां शक्तः प्रतिसमासने |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय १०७
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं त्वनन्तरस्तस्मादपि राजा भविष्यति |
२७ क
वन पर्व
अध्याय २४७
देवदूत उवाच
अय़ं त्वन्यो गुणः श्रेष्ठश्च्युतानां स्वर्गतो मुने |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
अय़ं त्वशास्त्रविन्मूढः स्वच्छन्दात्सम्प्रवर्तते ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय ४५
धृतराष्ट्र उवाच
अय़ं त्वां शकुनिः प्राह विवर्णं हरिणं कृशम् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १४३
युधिष्ठिर उवाच
अय़ं त्वानय़ितव्यस्ते भीमसेनः सदा निशि ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं त्वेको वृथादृष्टिर्धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
अय़ं दुरात्मा द्रुपदस्य पुत्रः; समागतो भीमसेनेन सार्धम् |
३९ ख
वन पर्व
अध्याय २३५
चित्रसेन उवाच
अय़ं दुरात्मा वद्धश्च गमिष्यामि सुरालय़म् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
अय़ं दैवतवंशो वै ऋषिवंशसमन्वितः |
२ क
सभा पर्व
अध्याय ५९
विदुर उवाच
अय़ं धत्ते वेणुरिवात्मघाती; फलं राजा धृतराष्ट्रस्य पुत्रः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
अय़ं धर्मश्च कालश्च यमो मृत्युश्च साक्षिणः ||
५१ ख
सभा पर्व
अध्याय ५८
युधिष्ठिर उवाच
अय़ं धर्मान्सहदेवोऽनुशास्ति; लोके ह्यस्मिन्पण्डिताख्यां गतश्च |
१४ क
स्त्री पर्व
अध्याय ४
विदुर उवाच
अय़ं न वुध्यते तावद्यमलोकमथागतम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
व्राह्मण उवाच
अय़ं न सुकृतं वेत्ति को न्वन्यो वेत्स्यते कृतम् |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
युधिष्ठिर उवाच
अय़ं नः सर्वधर्माणां धर्मश्चिन्त्यतमो मतः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
युधिष्ठिर उवाच
अय़ं नाराय़णः श्रीमान्सर्वपार्थिवसंमतः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं नीलाम्वुदश्यामो नरेष्वप्रतिमो भुवि |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं पन्था महर्षीणामिय़ं लोकविदां गतिः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
अय़ं पार्थः कुतः पार्थ एष पार्थ इति प्रभो |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
अय़ं पितरमाज्ञाय़ कामार्तं शन्तनुं पुरा |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
युधिष्ठिर उवाच
अय़ं पितामहेनोक्तो राजधर्मः सनातनः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं पुत्रस्त्वय़ा राजन्यौवराज्येऽभिषिच्यताम् ||
१५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं पुनर्मत्तगजेन्द्रगामी; प्रतप्तचामीकरशुद्धगौरः |
६ क
वन पर्व
अध्याय २८४
कर्ण उवाच
अय़ं पुराणः श्लोको हि स्वय़ं गीतो विभावसो |
३३ क
वन पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं पुरुषशार्दूलः साय़ुधोऽजिनसंवृतः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं पृथाय़ास्तनय़ः कनीय़ान्पाण्डुनन्दनः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय १४८
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं प्रध्वंसनः कालो नाद्य तद्रूपमस्ति मे ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं प्राणानुत्सिसृक्षुस्तं सर्वेऽभ्येत्य पृच्छत |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
अय़ं प्राप्य महत्कृच्छ्रं पुनर्वृद्धिं गमिष्यति ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
अय़ं प्रेतसमाकीर्णो यक्षराक्षससेवितः |
९१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
उमो उवाच
अय़ं भगवता दत्तः प्रश्नः स्त्रीधर्मसंश्रितः |
२० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं भद्रे तव मणिः पुत्रहन्ता जितः स ते |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं भीष्मस्तथा द्रोणः कर्णश्चाय़ं तथा कृपः ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय १७५
व्राह्मणा ऊचुः
अय़ं भ्राता तव श्रीमान्दर्शनीय़ो महाभुजः |
१९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १५
द्रौणिरु उवाच
अय़ं मणिरय़ं चाहमिषीका निपतिष्यति |
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
अय़ं मध्ये स्थितोऽस्माकं सात्यकिः सात्वताधमः |
५२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
अय़ं महास्त्रोऽप्रतिमो धृतः शरः; शरीरभिच्चासुहरश्च दुर्हृदः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
अय़ं मा समनुप्राप्तो वर्षपूगाभिचिन्तितः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
उमो उवाच
अय़ं मुनिगणः सर्वस्तपस्तप इति प्रभो |
२१ क