कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
निर्मनुष्यान्गजानश्वान्रथांश्चैव धनञ्जय़ |
६० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
निर्मनुष्यान्रथान्राजन्गजानश्वांश्च संय़ुगे |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
निर्मनुष्यान्रथान्राजन्गजानश्वांश्च संय़ुगे |
६९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
निर्मनुष्यान्रथान्राजन्सुय़ुक्ताञ्जवनैर्हय़ैः |
७२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
निर्मनुष्याश्च मातङ्गा विनदन्तस्ततस्ततः |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
निर्मनुष्ये महीपाल निःश्वापदमहीरुहे |
७८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
निर्मन्त्रो निर्व्रतो यः स्यादशास्त्रज्ञोऽनसूय़कः |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३६
सोम उवाच
निर्मन्युरपि निर्मानो यतिः स्यात्समदर्शनः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
निर्मन्युरुपशाखीय़ः पुरुषः क्लीवसाधनः ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३८
व्रह्मो उवाच
निर्ममत्वमनाशीस्त्वमपरिक्रीतधर्मता ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२८
व्यास उवाच
निर्ममश्चानहङ्कारो निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशय़ः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
निर्ममस्य ममत्वेन किं कृतं तासु तासु च |
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
निर्ममस्यागमवतो विस्मय़ः समुपागतः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
निर्ममा निरहङ्कारा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
निर्ममा निरहङ्काराः सत्त्वस्थाः समदर्शिनः ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
निर्ममा निष्प्रतिद्वन्द्वा निर्ह्रीका निष्प्रय़ोजनाः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
निर्ममे योषितं दिव्यां चिन्तय़ित्वा प्रय़त्नतः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
निर्ममे लोकसिद्ध्यर्थं व्रह्मा लोकपितामहः |
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
निर्ममे स तदा लोकान्कृत्स्नान्स्थावरजङ्गमान् ||
६६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ||
७१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३८
व्रह्मो उवाच
निर्ममो निरहङ्कारो निराशीः सर्वतः समः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
निर्ममो निरहङ्कारो निरीहो मुक्तवन्धनः |
२९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
निर्ममो निरहङ्कारो निर्योगक्षेम एव च ||
४३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४७
व्रह्मो उवाच
निर्ममो निरहङ्कारो मुच्यते नात्र संशय़ः ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४७
व्रह्मो उवाच
निर्ममो निरहङ्कारो मुच्यते नात्र संशय़ः ||
१४ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४४
व्रह्मो उवाच
निर्ममो निरहङ्कारो मुच्यते सर्वपाप्मभिः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
निर्मर्यादं प्रय़ुद्धानि तत्ते वक्ष्यामि भारत ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
निर्मर्यादं महद्युद्धमवर्तत सुदारुणम् |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
निर्मर्यादं हि युध्यन्ते पितृभिर्भ्रातृभिः सह ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
निर्मर्यादमभूद्युद्धं रात्रौ घोरं भय़ावहम् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
निर्मर्यादा दस्यवस्तु भवन्ति परिपन्थिनः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
इन्द्र उवाच
निर्मर्यादाः काममन्युप्रवृत्ता; भीता राज्ञो नाधिगच्छन्ति पापम् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
भीष्म उवाच
निर्मर्यादानि दस्यूनां निरनुक्रोशकारिणाम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
निर्मर्यादे चाशने क्रूरवृत्तौ; हिंसात्मके त्यक्तधर्मस्ववृत्ते |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८९
सञ्जय़ उवाच
निर्मर्यादे तथा भूते वैशसे लोमहर्षणे ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
निर्मर्यादे तथा युद्धे वर्तमाने भय़ानके |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
निर्मर्यादे तथा युद्धे वर्तमाने सुदारुणे |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
इन्द्र उवाच
निर्मर्यादे नित्यमर्थे विनष्टा; नाहुस्तान्वै पशुभूतान्मनुष्यान् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
निर्मर्यादे वर्तमाने दानवैकाय़ने कृते |
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
निर्मर्यादे विद्रवे घोररूपे; सर्वा दिशः प्रेक्षमाणाः स्म शून्याः |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
निर्मलानामजिह्मानां नाराचानां विशां पते |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
निर्मलानि शरीराणि विशुद्धानि शरीरिणाम् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
निर्मलाभिश्च मुक्ताभिर्मणिभिश्च महाधनैः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
निर्मलीकुरुते वुद्ध्या सोऽमुत्रानन्त्यमश्नुते ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
निर्मांसगात्र्यः श्वेताश्च तथा काञ्चनसंनिभाः ||
३१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
निर्मांसाः कोकवक्त्राश्च श्येनवक्त्राश्च भारत |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
निर्माणं च शरीरस्य ततो धैर्यमवाप्नुहि ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
निर्माणमेतद्युष्माकं प्रवृत्तिगुणकल्पितम् |
६० क
भीष्म पर्व
अध्याय
३७
श्रीभगवानु उवाच
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा; अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः |
५ क