वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
निर्याय़ कपिशार्दूलो हनूमान्पर्यवस्थितः ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
निर्याय़ खाण्डवप्रस्थात्प्रतीचीमभितो दिशम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
निर्याय़ च महावाहुर्वासुदेवो महामनाः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
निर्याय़ तस्मादुद्देशात्पश्यामो लवणाम्भसः |
४२ क
विराट पर्व
अध्याय
३१
वैशम्पाय़न उवाच
निर्याय़ नगराच्छूरा व्यूढानीकाः प्रहारिणः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
निर्याय़ योधय़ामासुः कुमारा वृष्णिनन्दनाः ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
निर्यूथमिव मातङ्गं समहृष्यन्त पाण्डवाः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
निर्लज्जा नरशार्दूल व्याहरन्ति च तद्वचः ||
५३ ख
वन पर्व
अध्याय
१३७
लोमश उवाच
निर्लज्जो लज्जय़ा युक्तां कामेन हृतचेतनः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
निर्वनो वध्यते व्याघ्रो निर्व्याघ्रं छिद्यते वनम् |
४८ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
निर्वन्धं परमं चक्रुस्तदा वै युद्धकाङ्क्षिणः ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२१
नारद उवाच
निर्वन्धतश्चातिमात्रं गालवेन महीपते ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
निर्वन्धतस्तु वहुशो गालवस्य तपस्विनः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
निर्वाणं तु सुदुष्पारं वहुविघ्नं च मे मतम् ||
१६ ग
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
निर्वाणं नाधिगच्छेय़ुर्जीवेय़ुः पशुजीविकाम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
निर्वाणं परमं सौख्यं धर्मोऽसौ पर उच्यते |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
निर्वाणं सर्वधर्माणां निवृत्तिः परमा स्मृता |
६३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
निर्वाणं ह्लादनं चैव व्रह्मलोकः परा गतिः ||
१४० ख
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
निर्वाणकाले दीपस्य वर्तीमिव दिधक्षतः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
निर्वाणद सहस्रांशो नमस्तेऽस्तु सुखाश्रय़ ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
निर्वाणमगमद्धीमान्सुसुखी चाभवत्तदा ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८२
भृगुरु उवाच
निर्वाणादेव निर्वाणो न च किञ्चिद्विचिन्तय़ेत् |
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
निर्वादादास्पदं लव्ध्वा धनवृद्धिर्भविष्यति |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
निर्वादैर्निर्वदेदेनमन्ततस्तद्भविष्यति ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३७
वैशम्पाय़न उवाच
निर्वापय़न्तो ज्वलनं ते जना ददृशुस्ततः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
निर्वासनं च नगरात्प्रव्रज्या च परन्तप |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
अष्टावक्र उवाच
निर्विकारमृषिं चापि काष्ठकुड्योपमं तदा |
५२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
निर्विघ्ना निश्चला रुद्रे भक्तिरव्यभिचारिणी |
१६० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०२
भीष्म उवाच
निर्विचेष्टं जगच्चापि वभूवातिभृशं तदा |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
निर्विचेष्टं भुजङ्गं तं विशस्य मृगजीवनः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
निर्विचेष्टं शरीरं तद्वभूवाप्रिय़दर्शनम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
निर्विचेष्टैरजानद्भिः परमात्मा प्रदीपवत् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
निर्विण्णः स तु विप्रर्षिर्निराशः समपद्यत ||
२२ ख
मौसल पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
निर्विण्णमनसं दृष्ट्वा पार्थं व्यासोऽव्रवीदिदम् ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
निर्विण्णमनसं पार्थं ज्ञात्वा वृष्णिकुलोद्वहः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४७
शौनक उवाच
निर्विण्णात्मा परोक्षो वा धिक्कृतः सर्वसाधुषु ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
निर्विण्णात्मा हतमना मुञ्चैतां पापजीविकाम् |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
निर्विण्णोऽस्मि भृशं तात देहेनानेन भारत |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
निर्विद्धस्तु शरैर्घोरैरक्रुध्यत्सात्यकिर्भृशम् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
निर्विद्य हि नरः कामान्निय़म्य सुखमेधते |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
निर्विद्यते ततः कृत्स्नं मार्गमाणः परं पदम् |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
निर्विद्यमानः सुभृशं भूय़ो वक्ष्यामि साम्प्रतम् |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
निर्विभेद च नाराचैः शतशोऽथ सहस्रशः |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
निर्विभेद तु वेगेन षड्भिश्चाप्यपरैर्नदन् ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
निर्विभेद त्रिभिश्चान्यैः सारथिं चास्य पत्रिभिः ||
७० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
निर्विभेद महाराज राजपुत्रं वृहद्वलम् |
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
निर्विभेद महावीर्यो विव्यथे नैव चार्जुनात् ||
४५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
निर्विभेद महावेगैस्त्वरन्वज्रीव पर्वतम् ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
निर्विभेद रणे राजा सर्वसैन्यस्य पश्यतः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०९
वैशम्पाय़न उवाच
निर्विभेद शरैस्तीक्ष्णैः पाण्डुः पञ्चभिराशुगैः ||
६ ख