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वन पर्व
अध्याय १८४
सरस्वत्यु उवाच
न चाशुचिर्नाप्यनिर्णिक्तपाणि; र्नाव्रह्मविज्जुहुय़ान्नाविपश्चित् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूय़ति ||
६७ ख
वन पर्व
अध्याय १०५
लोमश उवाच
न चाश्वमधिगच्छामो नाश्वहर्तारमेव च ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
न चाश्वमेधैर्वहुभिः फलं सममिदं तव ||
७८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
न चासने स्वय़ं वुद्धिं वीभत्सुर्व्यदधात्तदा ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ९२
प्रतीप उवाच
न चासवर्णां कल्याणि धर्म्यं तद्विद्धि मे व्रतम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ४५
सूत उवाच
न चाससाद गहने मृगं नष्टं पिता तव ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
न चासां मांसमश्नीय़ाद्गवां व्युष्टिं तथाश्नुते ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३९
युधिष्ठिर उवाच
न चासां मुच्यते कश्चित्पुरुषो हस्तमागतः |
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
न चासीतासने भिन्ने भिन्नं कांस्यं च वर्जय़ेत् |
३४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
न चासौ धार्तराष्ट्राणां श्रूय़ते निनदस्तथा |
७४ क
आदि पर्व
अध्याय १४९
कुन्त्यु उवाच
न चासौ राक्षसः शक्तो मम पुत्रविनाशने |
१४ क
वन पर्व
अध्याय १३२
लोमश उवाच
न चास्ति ते वसु किञ्चित्प्रजाता; येनाहमेतामापदं निस्तरेय़म् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६५
भीष्म उवाच
न चास्ति पथि भोक्तव्यं प्राणसन्धारणं मम |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
न चास्ति शक्तिस्त्रैलोक्ये कस्यचित्पुरुषोत्तम |
८० क
द्रोण पर्व
अध्याय ६६
अर्जुन उवाच
न चास्ति स पुमाँल्लोके यस्त्वां युधि पराजय़ेत् ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
न चास्त्रेण न शौर्येण तपसा मेधय़ा न च |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
न चास्थाने न चाकाले करानेभ्योऽनुपातय़ेत् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
न चास्नातां स्त्रिय़ं गच्छेत्तथाय़ुर्विन्दते महत् ||
१०० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
न चास्माञ्शरणं गच्छेत्कृष्णं वा पुरुषोत्तमम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
न चास्मि पालने शक्तो वहुदुःखसमन्वितः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
न चास्मि शक्तः परुषाणि सोढुं; पुनस्तवेमानि रुषान्वितस्य |
१०५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
न चास्मि शक्यः संय़न्तुमस्मात्कार्यात्कथञ्चन |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०९
भीष्म उवाच
न चास्मिन्न परे लोके यशस्तस्य प्रकाशते |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
न चास्मिन्सर्वशास्त्राणि प्रतरन्ति निगर्हणाम् |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६
मरुत्त उवाच
न चास्म्ययाज्यतां प्राप्तो भजमानं भजस्व माम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १९०
राजो उवाच
न चास्य कर्तुं नाशमभ्युत्सहामि; आय़ुष्मान्वै जीवतु वामदेवः ||
७७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
जनमेजय़ उवाच
न चास्य किञ्चिदप्राप्यं मन्ये लोकेष्वपि त्रिषु |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
न चास्य क्षीय़ते प्राणस्तदद्भुतमिवाभवत् ||
३५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ५
विदुर उवाच
न चास्य जीविते राजन्निर्वेदः समजाय़त ||
१८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ५
विदुर उवाच
न चास्य तृष्णा विरता पिवमानस्य सङ्कटे ||
१७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
न चास्य तेजसा रूपं दृश्यते शाम्यते तथा ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
न चास्य दासो न रथो न कुण्डले; समीपतो भ्राजति चाय़मिन्द्रवत् ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
न चास्य निय़माद्वुद्धिरपय़ाति महात्मनः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय ७३
वृहदश्व उवाच
न चास्य प्रतिवन्धेन देय़ोऽग्निरपि भामिनि |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४९
भीष्म उवाच
न चास्य मातापितरौ ज्ञाय़ेते स हि कृत्रिमः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
न चास्य मानसं किञ्चिद्विकारं ददृशे मुनिः |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
न चास्य रक्षां पश्यामि पृष्ठतो न च पार्श्वतः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
न चास्य वचनं किञ्चिदकृतं श्रूय़ते क्वचित् ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
न चास्य विवरं कश्चिद्ददर्श चरतो रणे ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
न चास्य वय़सा तुल्यः पृथिव्यामभवत्तदा ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
न चास्य शक्नुमः सर्वे प्रिय़े स्थातुमतन्द्रिताः ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय ६१
कश्यप उवाच
न चास्य शल्यं कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः ||
६९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
न चास्य शल्यं कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः |
४९ ख
शल्य पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
न चास्य शासनं कश्चित्तत्र चक्रे महारथः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
न चास्य संय़मो नाम क्वचिद्भवति कश्चन ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
न चास्य सदृशः कश्चित्क्षत्रिय़ो धर्मतोऽभवत् ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रय़ः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१०
भीष्म उवाच
न चास्य हीय़ते वर्णो न ग्लानिरुपजाय़ते |
२२ क
वन पर्व
अध्याय ६६
सुदेव उवाच
न चास्या नश्यते रूपं वपुर्मलसमाचितम् |
७ ख