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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रासृजदुग्राणि शरवर्षाणि पाण्डवः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६५
भीष्म उवाच
ततः प्राह द्विजश्रेष्ठान्विरूपाक्षो महाय़शाः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११४
भीष्म उवाच
ततः प्राह नदी गङ्गा वाक्यमुत्तरमर्थवत् |
७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्राह महातेजा धृतराष्ट्रो महीपतिः ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्राय़मुपासीना तूष्णीमासीज्जनाधिप ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
ततः प्राय़ाच्छनैः सूतः सात्वतस्य मते स्थितः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
ततः प्राय़ात्प्रीतिमान्वै रथेन; वैय़ाघ्रेण श्वेतय़ुजाथ कर्णः |
७४ क
विराट पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्राय़ादुदीचीं स कपिप्रवरकेतनः ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
ततः प्राय़ाद्द्रुतं राजन्व्रीडन्निव जनेश्वरः ||
४० ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
ततः प्राय़ाद्धूमकेतुर्महात्मा; वनस्पतीन्वीरुधश्चावमृद्नन् |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
ततः प्राय़ाद्धृषीकेशो रथेनाप्रतिय़ोधिना |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
ततः प्राय़ाद्रथेनाजौ सव्यसाची परन्तपः |
५३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
ततः प्राय़ाद्रथेनाशु केशवस्तव वाहिनीम् |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
ततः प्राय़ाद्रथेनाशु शल्यस्तत्र विशां पते |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्राय़ाद्वलो राजन्दक्षिणेन सरस्वतीम् ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्राय़ाद्वलो राजन्पूज्यमानो द्विजातिभिः |
५७ क
सभा पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्राय़ाद्विदुरोऽश्वैरुदारै; र्महाजवैर्वलिभिः साधुदान्तैः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
ततः प्राय़ाद्वै त्वरितः सात्यकिः सत्यविक्रमः ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्राय़ान्महाराज माधवो भगवान्रथी |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
ततः प्राय़ान्महाराज सारथिस्त्वरय़न्हय़ान् |
५८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
ततः प्राय़ान्महाराज सौवलेय़ः प्रतापवान् |
४६ क
वन पर्व
अध्याय १६५
अर्जुन उवाच
ततः प्राय़ामहं तेन स्यन्दनेन विराजता |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रीतं भवं ज्ञात्वा स्मृतिमानर्जुनस्तदा |
७८ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रीतमना द्रोणो मुहूर्तादिव तं पुनः |
६३ क
वन पर्व
अध्याय २८९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रीतमना भूत्वा स एनां व्राह्मणोऽव्रवीत् |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रीतमना रामः श्रुत्वा तीर्थफलं महत् |
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रीतमनाः क्षत्ता धृतराष्ट्रं विशां पते |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
ततः प्रीतमनाः पार्थो गन्धैर्माल्यैश्च माधवम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
ततः प्रीतश्च दैत्येन्द्रो भय़ं चास्याभवन्महत् |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
ततः प्रीतस्तु कौन्तेय़ भार्गवः कुरुनन्दन |
८ क
वन पर्व
अध्याय २८९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रीतिमवापाग्र्यां कुन्तिभोजो महामनाः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
च्यवन उवाच
ततः प्रीतेन ते राजन्पुनरेतत्कृतं तव |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
ततः प्रीतो जलधरः कृतकार्यो युधिष्ठिर |
२९ क
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
ततः प्रीतो महातेजाः कलिपोंऽशुमतोऽभवत् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
ततः प्रीतो महादेवः सपत्नीको वृषध्वजः |
१७० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
ततः प्रीतो महादेवः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः |
८८ क
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रीतो महासेनस्त्रिदशेभ्यो वरं ददौ |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
भीष्म उवाच
ततः प्रीतोऽभवद्देव्याः प्रहसंश्चेदमव्रवीत् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
ततः प्रीतोऽभवद्राजा प्रह्रादो व्रह्मवादिने |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
ततः प्रेतः परिक्लिष्टः पश्चाज्जाय़ति व्राह्मणः ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
ततः प्रेत्य महाराज पुनर्जाय़ति सूकरः |
६४ क
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रेम्णा वृत्रशत्रुरर्जुनस्य शुभं मुखम् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
ततः प्रोवाच कुशिको भार्यां हर्षसमन्वितः |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रोवाच कौन्तेय़ो मुमूर्षूञ्श्लक्ष्णय़ा गिरा ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
भीष्म उवाच
ततः प्रोवाच तं व्रह्मा शक्रं वलनिसूदनम् |
१४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रोवाच ताः सर्वाः क्षत्रिय़ा निहतेश्वराः ||
१७ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
अहल्यो उवाच
ततः प्रोवाच पत्नीं स न ते सम्यगिदं कृतम् |
३३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रोवाच पुत्राय़ नातिहृष्टमना इव ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रोवाच भगवांस्तामेवारुन्धतीं पुनः |
४३ क
शल्य पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रोवाच राजेन्द्र ददती पुत्रमस्य तम् |
१२ ख