विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
निवर्त्य गास्ततः सर्वाः पाण्डुपुत्रा महावलाः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
निवर्त्य च वनात्पार्थमानाय़्य च जनार्दनम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
२०१
नारद उवाच
निवर्त्य तपसस्तौ च व्रह्मलोकं जगाम ह ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
निवर्त्यतामापगेय़ः कामं युद्धात्पितामहाः |
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
निवर्त्यमानापि तु सा ज्ञातिभिर्नैव शक्यते ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
निवर्तय़ परद्रव्ये वुद्धिं गृद्धां नरर्षभ ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२
शल्य उवाच
निवर्तय़ मनः पापात्परदाराभिमर्शनात् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
सञ्जय़ उवाच
निवर्तय़ति युद्धार्थं मृधे देवेश्वरो यथा ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
निवर्तय़ध्वं संहृष्टा ममैषा परमा मतिः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
निवर्तय़ामास तदा वाक्यं चेदमुवाच ह ||
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
निवर्तय़ामास रथं शाल्वं प्रति महारथः ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
निवर्तय़ित्वा कुरुराष्ट्रवर्धनां; स्ततः स सर्वान्विदुरं च वीर्यवान् |
५५ क
सभा पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
निवर्तय़ित्वा च तदा पाण्डवान्सपदानुगान् |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
निवर्तय़ित्वा तु रथं केशवोऽर्जुनमव्रवीत् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
निवर्तय़ित्वा रसनं रसेभ्यो; घ्राणं च गन्धाच्छ्रवणे च शव्दात् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
मार्कण्डेय़ उवाच
निवर्तय़ित्वा सावित्रीं स्वमेव भवनं यय़ौ ||
५९ ख
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
निवर्तय़िष्यति त्वासौ यदि क्षत्ता समेष्यति |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
निवर्तय़ेतां तौ शापमन्योऽन्येन तदा मुनी ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
निवर्तय़ेथाः पुत्रांश्च न त्वां व्यसनमाव्रजेत् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६८
युधिष्ठिर उवाच
निवर्तय़ेम पापं हि तृष्णय़ा कारिता वय़म् ||
२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१९
गान्धार्यु उवाच
निवर्हणममित्राणां दुःसहं विषहेत कः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
निवसति भृशमसुखं पितृविषय़; विपिनमवगाह्य स पापः ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
निवसध्वं वर्षपूगान्वनेषु; दुःखं वासं पाण्डवा धर्महेतोः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१००
नारद उवाच
निवसन्ति दिशापाल्यो धारय़न्त्यो दिशः स्मृताः ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
निवसन्ति वने ये च तान्सर्वानजय़त्प्रभुः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२१५
मार्कण्डेय़ उवाच
निवसन्ति वने ये तु तस्मिंश्चैत्ररथे जनाः |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
निवसन्ती निरावाधा तथैव गिरिसानुषु |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
मातलिरु उवाच
निवसन्त्यत्र राजेन्द्र गतोद्वेगा निरुत्सुकाः |
१२ ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
निवसन्नानय़ामास वृष्णिदारान्धनञ्जय़ः ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
निवसामार्यया हीनाः कृष्ण धौम्यपुरःसराः ||
१०४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
निवसामि मनुष्येन्द्रे सदैव वलसूदन ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३४
श्रीभगवानु उवाच
निवसिष्यसि मय़्येव अत ऊर्ध्वं न संशय़ः ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
६६
दुर्योधन उवाच
निवसेम वय़ं ते वा तथा द्यूतं प्रवर्तताम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१७१
अर्जुन उवाच
निवातकवचा घोरा यैर्मय़ा विनिपातिताः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
निवातकवचा नाम दानवा मम शत्रवः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
९८
नारद उवाच
निवातकवचा नाम दानवा युद्धदुर्मदाः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
निवातकवचा येन देवैरपि सुदुर्जय़ाः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
निवातकवचांश्चैव ततोऽहं शक्रमागमम् ||
६१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
निवातकवचाञ्जघ्ने कालकेय़ांश्च वीर्यवान् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
निवातकवचानां च वधं सङ्ख्ये महौजसाम् ||
६३ ख
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
निवातकवचानां तु प्रस्थितं मां वधैषिणम् |
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
निवातकवचान्युद्धे वासवेनापि दुर्जय़ान् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
निवातकवचाश्चापि देवानां शत्रवस्तथा |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
निवातकवचाश्चैव संसाध्याः कुरुनन्दन ||
१९ ग
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
निवातकवचैर्युद्धं हिरण्यपुरवासिभिः ||
१२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
निवातकवचैर्युद्धे कालकेय़ैश्च दानवैः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
निवाते च यथा दीप्यन्दीपस्तद्वत्स दृश्यते |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
निवाते तु यथा दीपो ज्वलेत्स्नेहसमन्वितः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३८
व्यास उवाच
निवाते वा यथा दीपो दीप्यमानो न कम्पते ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
निवाते वा यथा दीपो दीप्येत्कुशलदीपितः ||
३६ ख