द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
धृतराष्ट्र उवाच
निशीथे समसज्जेतां तद्युद्धमभवत्कथम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
निशीथे सूतपुत्रेण शरवर्षेण पीडिताः |
४५ क
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
निश्चक्रमुस्ततः सर्वास्ताः स्त्रिय़ो भरतर्षभ |
५० क
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
निश्चक्राम ततः शुभ्राद्धार्तराष्ट्रनिवेशनात् ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
निश्चक्राम ततः शौरिः सधूम इव पावकः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
निश्चक्राम ततः श्रीमान्पुनरेव महाय़शाः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
निश्चक्राम ततः सर्वान्परिचिक्षेप पार्थिवान् ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२४
धृतराष्ट्र उवाच
निश्चक्राम ततस्तस्मात्पृष्टश्चाह महात्मना |
५२ ख
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
निश्चक्राम तदा राजा त्यक्त्वा सुविपुलां श्रिय़म् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
निश्चक्राम नदी तेन प्रहारविवरेण सा ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
निश्चक्राम पुरात्तस्माद्यथा देवपतिस्तथा |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
निश्चक्राम पुराद्दीना रुदती कुररी यथा ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
निश्चक्राम महातेजा न च तं मृत्युराविशत् |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
निश्चक्राम महावाहुः सिंहखेलगतिस्ततः ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
निश्चक्राम रणाद्भीमो मत्स्यो जालादिवाम्भसि ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
निश्चक्रामाश्रमात्तस्मात्तापसीवेषधारिणी ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
निश्चरद्भिर्यथाय़ोगमुदासीनैर्यदृच्छय़ा ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
निश्चरन्तो व्यदृश्यन्त सूर्यात्सप्त महाग्रहाः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
निश्चलोर्ध्वशिखस्तद्वद्युक्तमाहुर्मनीषिणः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
निश्चितं धार्तराष्ट्राणां सकर्णानां जनार्दन |
९ क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
निश्चितं मे सदैवैतत्पुरस्तादपि भामिनि ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
निश्चितश्चार्थशास्त्रज्ञैरविश्वासः सुखोदय़ः |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
निश्चिता खलु मे वुद्धिरतिथिप्रतिपूजने ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
निश्चिताः सर्वधर्मज्ञास्तान्देवा व्राह्मणान्विदुः ||
४२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
निश्चितानामनारम्भं मन्त्रस्यापरिरक्षणम् ||
९७ ख
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
निश्चितेय़ं मम मतिः स्थिता प्राय़ोपवेशने |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
४६
सूत उवाच
निश्चितेय़ं मम मतिर्या वै तां मे निवोधत ||
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
निश्चित्य ग्रहणं नित्यमव्यक्तं नात्र संशय़ः ||
३३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
निश्चित्य तु यथाप्रज्ञं यां मतिं साधु पश्यति |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
निश्चित्य मनसा राजन्वधाय़ास्य मनो दधे ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२४३
वैशम्पाय़न उवाच
निश्चित्य मनसा वीरो दत्तभुक्तफलं धनम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१२३
लोमश उवाच
निश्चित्य मनसा वुद्ध्या देवी वव्रे स्वकं पतिम् ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
३८
सूत उवाच
निश्चित्य मन्त्रिभिश्चैव सहितो मन्त्रतत्त्ववित् |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
निश्चित्य वहुधैवं स सात्यकिर्युद्धदुर्मदः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
निश्चित्य विससर्जेमां सत्यवत्या मते स्थितः ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
निश्चिन्तमव्ययं नित्यं हृदिस्थमपि नित्यदा |
४७ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
निश्चीरां च समासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुताम् |
११९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
निश्चेरुरपिधानेभ्यः खड्गाः प्रज्वलिता भृशम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
निश्चेरुर्दह्यतो रात्रौ वृक्षस्येव स्वरन्ध्रतः ||
५० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
निश्चेष्टं तुमुले दीनं वभौ तस्मिन्महारणे |
७५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
निश्चेष्टं स्तव्धनय़नं यथालेख्यगतं तथा ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
निश्चेष्टः कौरवश्रेष्ठ प्रद्युम्नोऽभूद्रणाजिरे ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
निश्चेष्टः कौरवश्रेष्ठो मुहूर्तं स व्यतिष्ठत ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
निश्चेष्टः पाण्डवो राजन्सुष्वाप मृतकल्पवत् ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
निश्चेष्टा अभवन्राजन्नश्मसारमय़ा इव ||
२२ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
निश्चेष्टांस्तु ततो योधानवधीत्पाण्डुनन्दनः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
निश्चेष्टाभ्यां शरीराभ्यां स्थिरदृष्टी समाहितौ |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
निश्चेष्टावस्थिता सङ्क्ये अश्मसारमय़ी यथा ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
निश्चेष्टो मारुताहारो निर्ममः स्वर्गकाङ्क्षय़ा ||
३ ख