आदि पर्व
अध्याय
७३
देवय़ान्यु उवाच
निष्कृतिर्मेऽस्तु वा मास्तु शृणुष्वावहितो मम |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
निष्कृतिर्विहिता राजन्कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
निष्कृतिर्विहिता सद्भिः कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
निष्कैककण्ठमददं योजनाय़तं; तद्विस्तीर्णं काञ्चनपादपानाम् |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
निष्कैर्गोभिर्हिरण्येन वासोभिश्च महाधनैः |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
निष्कैवल्यं तदा युद्धं प्रापुरश्वनरद्विपाः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
निष्कैवल्येन पापेन तिर्यग्योनिमवाप्नुय़ात् |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
निष्क्रम्य गौतमोऽगच्छत्समुद्रं प्रति भारत ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
निष्क्रम्य ते नरव्याघ्रा दंशिताश्चित्रय़ोधिनः |
३७ क
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
निष्क्रम्य नगरात्तस्माद्योधय़ामास पाण्डवम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
निष्क्रम्य वनमास्थाय़ ज्ञानय़ुक्तो जितेन्द्रिय़ः |
२५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
निष्क्रम्य शिविरात्तस्मात्ताभ्यां सङ्गम्य वीर्यवान् |
१४० क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
निष्क्रम्यान्तःपुराच्चैव युधिष्ठिरसहाय़वान् |
५३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
निष्क्रान्तः पृतनामध्यान्न हन्तव्यः कथञ्चन ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
निष्क्रान्तमथ तं दृष्ट्वा ज्वलन्तमिव तेजसा |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
निष्क्रान्ते च रणात्पार्थे संशप्तकवधं प्रति ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
निष्क्रान्ते मय़ि कल्याणि तथा संनिहितेऽनघे |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
निष्क्रामंश्चाप्यपश्यत्स पत्नीस्तेषां महात्मनाम् |
४२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
निष्क्रामन्कम्पय़त्याशु तच्छरीरमचेतनम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
निष्क्रिय़ो दारुणाकारः कृष्णो दस्युरिवाधमः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
नहुष उवाच
निष्क्रय़ार्थं भगवतो यथाह भृगुनन्दनः ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
निष्क्रय़ो दीय़तां मह्यं व्राह्मणा हि धनार्थिनः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
निष्टनन्तः सरुधिरा विसञ्ज्ञा गाढवेदनाः |
४४ क
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
निष्टनन्तः स्म दृश्यन्ते पार्थवाणहता नराः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
निष्टनन्ति च मातङ्गा मुञ्चन्त्यश्रूणि वाजिनः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
निष्टनन्तो ह्युभय़तस्तत्र वानरराक्षसाः |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
निष्टनन्भीमसेनं च विजय़ं चेदमव्रवीत् ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
निष्टानको महानासीत्तव सैन्यस्य मारिष |
४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
निष्टानको महानासीत्सैन्यानां तव भारत |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
निष्ठा कृता तेन यदा सह स्या; त्तं तत्र मार्गं प्रणय़ेदसक्तम् ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
निष्ठां नाराय़णमृषिं नान्योऽस्तीति च वादिनः ||
६५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
निष्ठान्तं पश्य चापि त्वं क्षत्रधर्मं च केवलम् ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५
वासुदेव उवाच
निष्ठामापत्स्यते मूढः क्रुद्धे गाण्डीवधन्वनि ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
निष्ठितां धर्मराजाय़ मय़ो राज्ञे न्यवेदय़त् ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
निष्ठीव्य तु तथा क्षुत्वा स्पृश्यापो हि शुचिर्भवेत् ||
१०४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
निष्ठुरं त्यक्तधर्माणमाक्रोशनपराय़णम् ||
२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वासुदेव उवाच
निष्ठुरं वैरपरुषं वृद्धानां शासनातिगम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
निष्ठुरः स च नैष्ठुर्याद्भज्येदपि न संनमेत् |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
निष्ठुरा हीनकर्माणस्तेन हीय़न्ति संय़ुगे ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
निष्ठूरिणं कृतवैरं कृतघ्न; मेतान्भृशार्तोऽपि न जातु याचेत् ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३१
सूत उवाच
निष्ठ्यूनको हेमगुहो नहुषः पिङ्गलस्तथा |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
निष्पङ्को रसवत्तोय़ो नात्युष्णशिशिरः सुखः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
निष्पतन्ति तथा वाणास्तन्मातलिरपूजय़त् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०८
सुपर्ण उवाच
निष्पतन्ति पुनः सूर्यात्सोमसंय़ोगय़ोगतः ||
१५ ग
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
निष्पतन्तो अदृश्यन्त नगेभ्य इव पन्नगाः ||
४५ ख
विराट पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
निष्पतन्तो रथात्तस्य धौता हैरण्यवाससः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
निष्पत्य पतितो भूमौ देवानां भरतर्षभ ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
निष्पत्रमफलं शुष्कमशरण्यं पतत्रिणाम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०४
गुरुरु उवाच
निष्पन्नो दृश्यते व्यक्तमव्यक्तात्सम्भवस्तथा ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
निष्पपात गृहाद्राजन्सहैव परिचारिभिः ||
१ ख