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उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
निय़न्तव्यः सदा क्रोधो वृद्धवालातुरेषु च ||
२७ ख
विराट पर्व
अध्याय ६३
विराट उवाच
निय़न्ता चेन्न विद्येत न कश्चिद्धर्ममाचरेत् ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
भीष्म उवाच
निय़न्ता सर्वलोकस्य धर्माक्रान्तस्य भारत ||
५५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३४
कुन्त्यु उवाच
निय़न्तारमसाधूनां गोप्तारं धर्मचारिणाम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय २६१
मार्कण्डेय़ उवाच
निय़न्तारमसाधूनां गोप्तारं धर्मचारिणाम् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय २५
कश्यप उवाच
निय़न्तुं न हि शक्यस्त्वं भेदतो धनमिच्छसि |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
निय़न्तुः शिल्पय़त्नाभ्यां प्रेषितोऽरिशरार्दितः |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
निय़मं कञ्चिदारप्स्ये युवय़ोर्यदि रोचते |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
च्यवन उवाच
निय़मं कञ्चिदारप्स्ये शुश्रूषा क्रिय़तामिति ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
युधिष्ठिर उवाच
निय़मं चोपवासानां सर्वेषां व्रूहि पार्थिव |
३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
निय़मव्यपदेशेन गान्धारी च यशस्विनी ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
मार्कण्डेय़ उवाच
निय़मव्रतसंसिद्धा महाभागा पतिव्रता ||
१८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
निय़मव्रतसम्पन्नैः समाकीर्णं तपस्विभिः |
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२३
वासुदेव उवाच
निय़मस्थोऽप्रमत्तश्च तस्मात्सर्वत्र पूजितः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
निय़मांस्तदा परित्यज्य व्यद्रवन्त द्विजातय़ः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
निय़मात्सर्ववर्णानां व्रह्मोत्तरमवर्तत ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
भीष्म उवाच
निय़मानां क्रतूनां च त्वय़ावाप्तमिदं फलम् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
युधिष्ठिर उवाच
निय़मानां फलं किं च स्वधीतस्य च किं फलम् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७४
भीष्म उवाच
निय़मानां फलं राजन्प्रत्यक्षमिह दृश्यते |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
निय़मान्सुविचित्रांश्च विविधानि तपांसि च |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५०
व्रह्मो उवाच
निय़मे च विसर्गे च भूतात्मा मन एव च ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
निय़मे च विसर्गे च भूतात्मा मनसस्तथा ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २८८
कुन्त्यु उवाच
निय़मेन परेणाहमुपस्थास्ये द्विजोत्तमम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय २८६
सूर्य उवाच
निय़मेन प्रदद्यास्त्वं कुण्डले वै शतक्रतोः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय १६०
गन्धर्व उवाच
निय़मैरुपवासैश्च तपोभिर्विविधैरपि ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
निय़मैश्चोपवासैश्च कर्शय़न्देहमात्मनः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
निय़मो ह्येष धर्मेषु यतीनां शून्यवासिता |
१६८ क
विराट पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
निय़म्य च ततो रश्मीन्यत्र ते कुरुपुङ्गवाः |
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
कृप उवाच
निय़म्य दिव्यान्यस्त्राणि नाय़ुध्यत यथा पुरा ||
११७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३६
व्रह्मो उवाच
निय़म्यते तमो यत्र रजस्तत्र प्रवर्तते |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३६
व्रह्मो उवाच
निय़म्यते रजो यत्र सत्त्वं तत्र प्रवर्तते ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
निय़म्याः संविभज्याश्च धर्मानुग्रहकाम्यया ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७८
भीष्म उवाच
निय़म्याः संविभज्याश्च प्रजानुग्रहकारणात् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
निय़म्याः सर्व एवैते ये राष्ट्रस्योपघातकाः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४९
भीष्म उवाच
निय़ुक्तजश्च विज्ञेय़ः सुतः प्रसृतजस्तथा ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
निय़ुक्ता राक्षसाश्चैव ये ते संशप्तका इति |
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
निय़ुक्तो भीमसेनश्च द्रौपद्या गन्धमादने |
११२ क
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
निय़ुङ्क्ष्व चापि मां कृत्ये सर्वं कर्तास्मि ते वचः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
निय़ुज्यमानाः स्थास्यन्ति पाण्डवा धर्मवर्त्मनि |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८७
भीष्म उवाच
निय़ुञ्ज्याच्च प्रय़त्नेन सर्ववर्णान्स्वकर्मसु ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १७५
व्राह्मणा ऊचुः
निय़ुध्यमानो विजय़ेत्सङ्गत्या द्रविणं वहु ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७६
अकृतव्रण उवाच
निय़ोक्ष्यति महात्मा तं रामस्त्वद्धितकाम्यया ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
निय़ोगधर्मिणा चैव निय़ोगात्मा भवत्यपि |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय ५५
विदुर उवाच
निय़ोगाच्च हते तस्मिन्कृष्णेनामित्रघातिना |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
निय़ोगादद्य यास्यामि वृद्धिमानृद्धिमान्भव ||
२७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
निय़ोगादस्य च गुरोर्व्यासस्यामिततेजसः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
निय़ोगाद्राक्षसेन्द्रस्य जग्मुर्भीमपराक्रमाः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
निय़ोगाद्राजसिंहस्य गन्तुमर्हसि मानद ||
१६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
निय़ोगाद्व्रह्मणः पूर्वं मय़ा स्वेन वलेन च |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
निय़ोगाद्व्रह्मणस्तात मर्त्यतां समुपागतः |
१८ ख