शान्ति पर्व
अध्याय
११
ऋषय़ ऊचुः
निय़ोगे चैव धर्मात्मन्स्थातुमिच्छाम शाधि नः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
निय़ोजय़ति कृत्येषु स राज्यफलमश्नुते ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
निय़ोजय़ामास तदा द्वैरथे राक्षसेश्वरम् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
निय़ोजय़ेद्यथावत्तांस्त्रिविधेष्वेव कर्मसु ||
५६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७५
व्राह्मणा ऊचुः
निय़ोधकाश्च देशेभ्यः समेष्यन्ति महावलाः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
नीचद्रुमा महाकक्षा सोदका हस्तिय़ोधिनाम् ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
नीचस्य वलमेतावत्पारुष्यं यत्त्वमात्थ माम् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
धृतराष्ट्र उवाच
नीचात्मना नृशंसेन क्षुद्रेण गुरुघातिना ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
नीचैः स्थित्वा तु विदुर उपास्ते स्म विनीतवत् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
नीचैर्गृध्रा निलीय़न्ते भारतानां चमूं प्रति ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७२
भीमसेन उवाच
नीचैर्भूत्वानुय़ास्यामो मा स्म नो भरता नशन् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
नीडं शकुन्ता इव जातपक्षा; श्छन्दांस्येनं प्रजहत्यन्तकाले ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
नीडं शकुन्ता इव जातपक्षा; श्छन्दांस्येनं प्रजहत्यन्तकाले ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
यम उवाच
नीतश्चकार च तथा सर्वं तद्यमशासनम् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
नीता लोकममुं सर्वे धार्तराष्ट्राः ससौवलाः ||
९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
नीता लोकममुं सर्वे नानाशस्त्रात्तजीविताः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
नीतानमन्यन्त जना दृष्ट्वा भीष्मस्य विक्रमम् ||
७६ ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
नीतिं वृहस्पतिप्रोक्तां भ्रातॄन्मेऽग्राहय़त्पुरा |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
नीतिधर्मानुसरणं नित्यमुत्थानमेव च |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
नीतिधर्मार्थतत्त्वज्ञं पितृवच्च समाहितम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
शल्य उवाच
नीतिमत्र विधास्यामि देवि तां कर्तुमर्हसि ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
नीतिमन्तं महात्मानमादित्यसमतेजसम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
नीतिमन्तः परीप्सन्तो वृथा व्रूय़ुः परे मय़ि ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
नीतिमन्तस्तथा युक्ता दक्षा रक्ताश्च ते हताः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
नीतिमन्तो महेष्वासाः सर्वे युद्धविशारदाः |
५१ क
विराट पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
नीतिर्विधीय़तां चापि साम्प्रतं या हिता भवेत् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
नीतिर्ह्यनीतिः शुद्धात्मा शुद्धो मान्यो मनोगतिः ||
७७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
नीतिशास्त्रं च धर्मज्ञा ददृशुस्ते पितामहम् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
नीतोऽभिमन्युर्निधनं कदर्थीकृत्य वः परैः ||
७५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
यम उवाच
नीत्वा तं यमदूतोऽपि गृहीत्वा शर्मिणं तदा |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
नीरजातश्च भगवान्सोमो ग्रहगणेश्वरः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
नीरजातेन हि विना न किञ्चित्सम्प्रवर्तते ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
नील किं वहुभिर्दग्धैस्तव योधैः शरार्चिषा |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
नीलं काश्यं जय़ं शूरास्त्रय़स्त्रीन्प्रत्यवारय़न् ||
४३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
व्यास उवाच
नीलं चोक्षाणं मेध्यमभ्यालभन्तां; चलच्छिश्नं मत्प्रदिष्टं द्विजेन्द्राः ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
नीलकण्ठं महात्मानमसक्तं तेजसां निधिम् |
११६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
नीलकण्ठाय़ पिङ्गाय़ स्वर्णकेशाय़ वै नमः ||
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
नीलकौशेय़वसनः कैलासशिखरोपमः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
नीलचन्द्राकृतैः खड्गैर्वाहुभिः परिघोपमैः |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
२२
सूत उवाच
नीलजीमूतसङ्घातैर्व्योम सर्वं समावृणोत् ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
९
नारद उवाच
नीलपीतासितश्यामैः सितैर्लोहितकैरपि |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
नीलभास्वरवर्णैश्च पादपैरुपशोभितम् |
४१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१९
गान्धार्यु उवाच
नीलमेघपरिक्षिप्तः शरदीव दिवाकरः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
५२
सूत उवाच
नीलरक्तान्सितान्घोरान्महाकाय़ान्विषोल्वणान् ||
४ ख
मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
नीललोहितमाञ्जिष्ठा विसृजन्नर्चिषः पृथक् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
नीलवासा मदोत्सिक्त इदं वचनमव्रवीत् ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
नीलवासास्ततोऽगच्छच्छङ्खतीर्थं महाय़शाः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
नीलवैडूर्यसदृश इन्द्रनीलनिभः क्वचित् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
नीलशाद्वलसञ्छन्ने देवगन्धर्वसेविते ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
नीलशैलचय़प्रख्यं वलाकाभूषितं घनम् ||
७ ग