chevron_left  तथैवास्यर्त्विजःarrow_drop_down
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
तथैवास्यर्त्विजः सर्वे तुल्यवेषा विशां पते |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४७
वासुदेव उवाच
तथैवाहं मतिमता परिचिन्त्येह पाण्डुना |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
तथैवाय़ं गदापाणिर्धार्तराष्ट्रो गतक्लमः |
६० क
शल्य पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
तथैवाय़ुतशो योधास्तावकाः पाण्डवान्रणे |
३३ क
वन पर्व
अध्याय २६९
मार्कण्डेय़ उवाच
तथैवेन्द्रजितं यत्तं लक्ष्मणो मर्मभेदिभिः |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ४७
दुर्योधन उवाच
तथैवेन्द्राय़ुधनिभान्सन्ध्याभ्रसदृशानपि ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
तथैवेह परा वुद्धिः परं वुद्ध्या न पश्यति ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
तथैवेह भवेद्धर्मः सूक्ष्मः सूक्ष्मतरोऽपि च ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय १२१
राम उवाच
तथैवेय़ं धरा देवी सागरान्ता सपत्तना |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
तथैवेय़ं महीपाल प्रोच्यते कारणैस्त्रिभिः ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४८
व्रह्मो उवाच
तथैवैकत्वनानात्वमिष्यते विदुषां नय़ः |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४७
व्रह्मो उवाच
तथैवैकत्वनानात्वे स दुःखात्परिमुच्यते ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५०
नारद उवाच
तथैवैकपदे तात पुनरन्यानि सप्त सा ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २८३
मार्कण्डेय़ उवाच
तथैवैषापि कल्याणी द्रौपदी शीलसंमता |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०२
जनक उवाच
तथैवोत्क्रमणस्थानं देहिनोऽपि विय़ुज्यतः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
तथैवोत्क्रममाणं तु शृणुष्वावहितो नृप |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
तथैवोत्तरमाणस्य एकाग्रमनसस्तथा ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
तथैवोत्थापय़ामासुर्गान्धारीं राजय़ोषितः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३६
व्यास उवाच
तथैवोपरमन्राजन्स्वल्पेनापि प्रमुच्यते ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
तथैवोभे स्वर्गजय़ाय़ सृष्टे; तथा ह्युभे सत्पुरुषार्यगुप्ते ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
तथैवोरगसङ्घाताः पाण्डवस्य समीपतः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
भीष्म उवाच
तथैवौशनसं शास्त्रं विज्ञातं ते नराधिप ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
तथोक्तः स नृदेवेन विष्णुर्वज्रभृता इव |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
तथोक्तः सात्यकिं प्राह व्रज त्वं कार्यसिद्धय़े |
६९ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
तथोक्तवति गाङ्गेय़े परलोकाय़ दीक्षिते |
८४ क
आदि पर्व
अध्याय १८५
वैशम्पाय़न उवाच
तथोक्तवाक्यं तु पुरोहितं तं; स्थितं विनीतं समुदीक्ष्य राजा |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय ७
धृतराष्ट्र उवाच
तथोक्तश्च स्वय़ं राज्ञा स्निग्धं भ्रातृसमं वचः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
तथोक्ता तेन सार्थेन दमय़न्ती नृपात्मजा |
११७ क
आदि पर्व
अध्याय १०४
वैशम्पाय़न उवाच
तथोक्ता सा तु विप्रेण तेन कौतूहलात्तदा |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
तथोक्ता सासृजद्धेनुः पुरुषान्घोरदर्शनान् |
२१ क
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
तथोक्तास्तेन वीरेण कदर्थीकृत्य तद्वचः |
५१ क
शल्य पर्व
अध्याय ५
द्रौणिरु उवाच
तथोक्ते द्रोणपुत्रेण सर्व एव नराधिपाः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
तथोक्ते सहदेवेन वाक्ये वाक्यविशारदः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
तथोक्तो वासुदेवेन नित्यमन्युरमर्षणः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
तथोक्त्वा द्रोणपुत्रोऽपि तदोपस्पृश्य भारत |
६० क
मौसल पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
तथोक्त्वा मुनय़स्ते तु ततः केशवमभ्ययुः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
तथोक्त्वा योगमास्थाय़ ज्योतिर्भूतो महातपाः |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
तथोग्रसेनस्य सुतं प्रदुष्टं; वृष्ण्यन्धकानां मध्यगां तपन्तम् |
७२ क
आदि पर्व
अध्याय ९७
वैशम्पाय़न उवाच
तथोच्यमानो मात्रा च सुहृद्भिश्च परन्तपः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय २९४
वैशम्पाय़न उवाच
तथोत्कृत्य प्रददौ कुण्डले ते; वैकर्तनः कर्मणा तेन कर्णः ||
३८ ख
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
तथोत्तरां दिशं चापि परित्यज्य भय़ार्दिताः |
२७ क
स्त्री पर्व
अध्याय ७
विदुर उवाच
तथोन्मोचय़ते दुःखाद्यथात्मा स्थिरसंय़मः ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
तथोपकरणं सर्वं मङ्गलानि च सर्वशः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५८
भीष्म उवाच
तथोपकारिणं चैव मन्यते वञ्चितं परम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
तथोपजीविनां गङ्गा सर्वप्राणभृतामिह ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
तथोपनय़नं चैव द्विजाय़ैवोपपद्यते ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
तथोपमा ह्यमात्यास्ते राजंस्तान्परिशोधय़ ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
तथोपमामिमां मन्ये वागुरां सर्वघातिनीम् ||
४४ ख
सभा पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
तथोपरिगिरिं चैव विजिग्ये पुरुषर्षभः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
तथोपरिचराद्यन्ये विप्राः सम्यगधीय़ते ||
५० ख