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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
समरे शरसंवीता भारद्वाजेन मारिष ||
६६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
समरे समरश्लाघी त्वय़ा न सदृशोऽभवत् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
समरे सर्वसैन्यानामुपय़ातं धनञ्जय़म् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
समरे सर्वय़ोधानां धनूंष्यभ्यपतन्क्षितौ ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
समरे स्त्रीषु गृध्यन्तं भल्लेनापहरद्रथात् ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
समरेषु च विक्रान्तं पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ||
७५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
समरेषु जय़ं चैव प्रददौ लोकभावनः ||
४७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
समरेऽत्युग्रकर्माणः कर्मभिर्व्यञ्जितश्रमाः |
१ क
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
समरेऽभिव्यशीर्यन्त फल्गुनस्य रथं प्रति ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
समरेऽभ्यद्रवत्पाण्डूञ्जवमास्थाय़ मध्यमम् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
समरेऽमरसङ्काशः सौभद्रो न व्यषीदत ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय १८६
वैशम्पाय़न उवाच
समर्चय़ामासुरुपेत्य हृष्टाः; कुन्तीसुतान्पार्थिवपुत्रपौत्रान् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
समर्थ इति सङ्गृह्य स्थापय़ित्वा परीक्ष्य च |
७७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
समर्थं च तमैश्वर्ये महामतिरमन्यत ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
समर्थं तं हि मेने वै पार्थादभ्यधिकं रणे ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
समर्थं ते विशेषेण सानुवन्धस्य भारत ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
समर्थं मन्यसे यच्च कुन्तीपुत्रं वृकोदरम् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
समर्थं वासमर्थं वा कृशं वाप्यकृशं तथा |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
समर्थः पुत्रजनने स्वय़मेवैत्य भारत ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
समर्थः पोषणे चासि सुतय़ो रक्षणे तथा |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
अर्जुन उवाच
समर्थः प्रशमं चैषां कर्तुं त्वमसि केशव ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
समर्थः स महावाहुरेकाह्ना सुमहावलः |
३३ क
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
समर्थनासु सर्वासु हितं च प्रिय़मेव च |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
समर्थमपि ते वाक्यमसमर्थं भविष्यति ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५
भीष्म उवाच
समर्थमुपजीव्येमं त्यजेय़ं कथमद्य वै ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
समर्थमेकं पर्याप्तं कौरवाणां युय़ुत्सताम् |
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४
द्रुपद उवाच
समर्थश्च सुवीरश्च मार्जारः कन्यकस्तथा ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
समर्था धारणे चापि रुद्रतेजःप्रधर्षिता |
६५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
समर्था ये न पश्यन्ति गङ्गां पुण्यजलां शिवाम् ||
६६ ख
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
समर्था लङ्घने सिन्धोर्न तु कृत्स्नस्य वानराः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
समर्था शतशो वक्तुमथ वापि सहस्रशः ||
१६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
समर्था सकला पृथ्वी वहुधा सृज्यतामय़म् ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
समर्थाः प्रतिसंसोढुं कुतस्तदनुय़ाय़िनः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
समर्थाः स्म परान्राजन्विजेतुं समरे विभो ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
समर्थाञ्जीवने ज्ञात्वा मुक्तश्चर यथासुखम् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११९
सञ्जय़ उवाच
समर्थान्नावमन्यन्ते दीनानभ्युद्धरन्ति च ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
समर्थान्पूजय़ेद्यश्च नास्पर्ध्यैः स्पर्धते च यः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
समर्थान्यश्च न द्वेष्टि समर्थान्कुरुते च यः ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
समर्थाश्चाप्यदातारस्ते वै निरय़गामिनः ||
७८ ख
आदि पर्व
अध्याय २२४
वैशम्पाय़न उवाच
समर्थास्ते च वक्तारो न ते तेष्वस्ति मानसम् ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
समर्थास्त्रिदिवस्यापि पालने किं पुनः क्षितेः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
समर्थेनापि यन्मोहात्पुत्रस्ते न निवारितः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११४
नारद उवाच
समर्थेय़ं जनय़ितुं चक्रवर्तिनमात्मजम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
समर्थैर्वहुभिः क्रूरैर्घातितो नाभिपालितः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय ४१
भगवानु उवाच
समर्थो धारणे मोक्षे संहारे चापि पाण्डव ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ७५
दमय़न्त्यु उवाच
समर्थो योजनशतं गन्तुमश्वैर्नराधिप ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
समर्थो रक्षितुं राष्ट्रं नकुलश्च विशां पते ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५१
धृतराष्ट्र उवाच
समर्थो वलवान्पार्थो दृढधन्वा जितक्लमः |
५ ख
आदि पर्व
अध्याय २६
वृहस्पतिरु उवाच
समर्थो वलिनां श्रेष्ठो हर्तुं सोमं विहङ्गमः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
समर्थो वाप्यशक्तो वा शतेष्वेकोऽधिगम्यते ||
८३ ख