द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
नृनागाश्वान्विदेहासून्कर्तारश्च सहस्रशः ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३८
काश्यप उवाच
नृपं कुरुकुलोत्पन्नं परिक्षितमरिन्दमम् |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
नृपं निक्षिप्य गच्छेय़ं निरपेक्षो जय़द्रथम् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
४०
सूत उवाच
नृपं यमाहुस्तममित्रघातिनं; कुरुप्रवीरं जनमेजय़ं जनाः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
४०
सूत उवाच
नृपं शिशुं तस्य सुतं प्रचक्रिरे; समेत्य सर्वे पुरवासिनो जनाः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
नृपं शय़ानं गाङ्गेय़मिदमाह वचस्तदा ||
१ ग
आदि पर्व
अध्याय
१६३
गन्धर्व उवाच
नृपतिं त्वभ्यनुज्ञाय़ वसिष्ठोऽथापचक्रमे |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
नृपतिः सुमुखश्च स्यात्स्मितपूर्वाभिभाषिता ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
नृपतीन्समतिक्रम्य यैरराजा त्वमर्चितः ||
३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
नृपतेर्भग्नसक्थस्य श्रुत्वा तादृग्वचः पुनः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
नृपतेर्मतिदाः सन्ति सम्वन्धज्ञानकोविदाः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
नृपतेर्मुचुकुन्दस्य कथितां भार्गवेण ह ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
नृपतौ मार्दवोपेते हर्षुले च युधिष्ठिर ||
६० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
नृपधुरि च न गामय़ुङ्क्त भूय़; स्तुरगवरैरगमच्च यत्र तत्र ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
नृपस्नुषां राजभार्यां भर्तृदर्शनलालसाम् ||
११८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
नृपस्य सततं दण्डः सम्यग्धर्मे प्रशस्यते ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
नृपा दुर्योधनमुखा निःश्वस्य रुरुदुस्ततः |
१०३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
नृपाः सत्यैश्च दानैश्च न्याय़लव्धैस्तपोधनाः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
नृपाणां पृथिवीपाल प्रतिगृह्णन्ति वै द्विजाः ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६
मार्कण्डेय़ उवाच
नृपाश्च नाभागभगीरथादय़ो; महीमिमां सागरान्तां विजित्य |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
नृपाश्च प्रतिय़ुध्यन्तः पराक्रान्ता विशां पते |
७२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
नृपाश्च वहवो राजंस्तावत्सन्धिः प्रय़ुज्यताम् ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७९
भीष्म उवाच
नृपाय़ानुग्रहमना मुनिर्वाक्यमथाव्रवीत् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
नृपेणाहूय़मानस्य यत्तिष्ठति भय़ं हृदि |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११४
नारद उवाच
नृपेभ्यो हि चतुर्भ्यस्ते पूर्णान्यष्टौ शतानि वै |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
नृपोत्तमाय़ कौरव्य विश्रुताभिजनाय़ वै ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
नृलोके देवदेवस्य तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
नृशंस पापभूय़िष्ठ क्षुद्रकर्मसहाय़वान् |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१०९
मृग उवाच
नृशंसं कर्म सुमहत्सर्वलोकविगर्हितम् |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
नृशंसं तु परं तत्स्यात्त्यक्त्वा दुर्योधनं यदि |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
नृशंसं पतनीय़ं च तादृशं कृतवानसि ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय
६८
भीमसेन उवाच
नृशंसं परुषं क्रूरं शक्यं दुःशासन त्वय़ा |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
नृशंसं वत कौन्तेय़ कर्मेदं कृतवानसि |
४ क
वन पर्व
अध्याय
६०
वृहदश्व उवाच
नृशंसं वत राजेन्द्र यन्मामेवङ्गतामिह |
९ क
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
नृशंसं वत वैदर्भी कर्तुकामा तपस्विनी |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
नृशंसः स मय़ाक्रम्य रथ एव निपातितः |
३२ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
नृशंसकर्मंस्त्वमनार्यवृत्त; मा मां विवस्त्रां कृधि मा विकार्षीः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
नृशंसकारिणो भीरु यथैवोपहतं तथा ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
युधिष्ठिर उवाच
नृशंसकारिणो मूढाः क्व ते गच्छन्ति मानवाः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
कीट उवाच
नृशंसगुणभूय़िष्ठं पुरा कर्म कृतं मय़ा |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
नृशंसताय़ास्तैक्ष्ण्यस्य धर्मविद्वेषणस्य च |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
मुनिरु उवाच
नृशंसवृत्तिं पापिष्ठां दुःखां कापुरुषोचिताम् ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
भरद्वाज उवाच
नृशंसस्त्यक्तधर्मास्तु स्त्रीषु ज्ञातिषु गोषु च |
६१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
अम्वरीष उवाच
नृशंसस्त्यक्तधर्मोऽस्तु स्त्रीषु ज्ञातिषु गोषु च |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
नृशंसस्य ममाद्याय़ं प्रत्यादेशो न संशय़ः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
नृशंसानामनार्याणां परुषाणां च भाषणम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५८
युधिष्ठिर उवाच
नृशंसान्न विजानामि तेषां कर्म च भारत ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
नृशंसेन च वो युक्तांस्त्यजेय़ं शाश्वतीः समाः |
७६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
नृशंसेनातिलुव्धेन शक्याः पालय़ितुं प्रजाः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
ऋषय़ ऊचुः
नृशंसेनापनीतानि विसान्याहारकाङ्क्षिणाम् ||
५३ ख