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शान्ति पर्व
अध्याय १५८
युधिष्ठिर उवाच
नृशंसो ह्यधमो नित्यं प्रेत्य चेह च भारत |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
नृशंस्यामय़शस्यां च दुःखां कापुरुषोचिताम् ||
२३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
नृशोणितावसिक्तस्य द्रौणेरासीदसित्सरुः |
१३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
नृषु तस्मादविश्वासः पुष्कलं हितमात्मनः ||
१८७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३७
व्रह्मो उवाच
नृषु नारीषु भूतेषु द्रव्येषु शरणेषु च ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
नृसिंहं नरय़ुक्तेन परमालङ्कृतेन तम् |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय २८
काक उवाच
नृसिंहौ तौ नरश्वा त्वं जोषमास्स्व विकत्थन ||
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
नेक्षेतादित्यमुद्यन्तं न च नग्नां परस्त्रिय़म् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
नेक्षेतादित्यमुद्यन्तं नास्तं यान्तं कदाचन ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
नेङ्गन्ति तव रोमाणि स्थिरा वुद्धिस्तथा मनः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
नेच्छते दीय़मानं च साधु तावद्विमृश्यताम् ||
६० ख
विराट पर्व
अध्याय २०
द्रौपद्यु उवाच
नेच्छामि कञ्चिद्वध्यन्तं तेन जीवसि कीचक ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
नेच्छामि प्रतिघातं ते नास्मि विघ्नकरस्तव |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
नेच्छाम्येतदहं द्रष्टुं मित्राणां व्यसनं महत् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
वासुदेव उवाच
नेच्छेय़ं सात्वताहं तद्विना पार्थं धनञ्जय़म् ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय ३६
भीमसेन उवाच
नेतः पापीय़सी काचिदापद्राजन्भविष्यति |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
नेतः पापीय़सीं योनिं पतेय़मपरामिति ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
नेतव्यो वालिमार्गेण सर्वभूतगतिं त्वय़ा ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय ८३
नारद उवाच
नेता च त्वमृषीन्यस्मात्तेन तेऽष्टगुणं फलम् ||
९९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
नेता यस्य हृषीकेशो योद्धा यस्य धनञ्जय़ः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
नेतारस्तव सेनाय़ाः शूरा विक्रान्तय़ोधिनः |
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७४
भीष्म उवाच
नेति केचिद्व्यवस्यन्ति प्रत्याख्याता हि तेन सा ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३२
विदुरो उवाच
नेति चेद्व्राह्मणान्व्रूय़ां दीर्यते हृदय़ं मम |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
नेति नेति च तौ तात परस्परमथोचतुः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
नेति रामश्च तान्सर्वान्सान्त्वय़न्प्रत्यभाषत ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
नेतृहीना यथा नावः पुरुषानर्णवे नृप ||
५५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
नेत्यवोचमहं तांश्च क्षत्रधर्मव्यपेक्षय़ा ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
नेत्युवाच महर्षिस्तं ममैवैत इति व्रुवन् |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
नेत्रं चैकं ललाटेन भास्करप्रतिमं महत् |
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
नेत्ररोगः कोकिलानां ज्वरः प्रोक्तो महात्मना ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०७
गुरुरु उवाच
नेत्रहीनो यथा ह्येकः कृच्छ्राणि लभतेऽध्वनि |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
नेत्रानन्देन चन्द्रेण माहेन्द्री दिगलङ्कृता ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
नेत्राभ्यां क्रोधदीप्ताभ्यां सम्प्रैक्षन्निर्दहन्निव ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
नेत्राभ्यां नस्ततश्चैव श्रोत्राभ्यां च समन्ततः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
नेत्राभ्यां नेत्रय़ोरस्य रश्मीन्संय़ोज्य रश्मिभिः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
नेत्राभ्यां नेत्रय़ोरस्या रश्मीन्संय़ोज्य रश्मिभिः |
५६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
नेत्राभ्यां लोहितान्ताभ्यामाशीविष इव श्वसन् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
नेत्राभ्यां शकुनिः शूर उलूकश्च महारथः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
नेत्राभ्यां सरुजाभ्यां यः प्रतिवातमुदीक्षते |
७३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
नेत्राभ्यामतिताम्राभ्यां कैतव्यं समुदैक्षत ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां पादौ तस्य शनैः स्पृशन् ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यामिदं वचनमव्रवीत् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यामिदं वचनमव्रवीत् ||
३७ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
नेत्रे च दीप्ते सहसा विवृत्य; मद्राधिपं क्रुद्धमना निरैक्षत् ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
महेश्वर उवाच
नेत्रे मे संवृते देवि त्वय़ा वाल्यादनिन्दिते |
४३ क
वन पर्व
अध्याय १२४
लोमश उवाच
नेत्रे रविशशिप्रख्ये वक्त्रमन्तकसंनिभम् ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
नेत्रे शिखण्डी दुर्धर्षो धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वासुदेव उवाच
नेत्रैः पद्मदलप्रख्यैरपश्यन्त जनार्दनम् ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
नेत्रैरनिमिषै राजन्नवैक्षन्त प्रकोपिताः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
नेत्रैरनिमिषैर्दीनाः प्रत्यवेक्षन्परस्परम् ||
१७ ख