आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
जिह्वो उवाच
नेमे वाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथञ्चन |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
त्वगु उवाच
नेमे वाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथञ्चन |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
श्रोत्र उवाच
नेमे वाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथञ्चन |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
चक्षुरु उवाच
नेमे वाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथञ्चन |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
वुद्धिरु उवाच
नेमे वाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथञ्चन |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
नेमे शक्या मानुषेण युद्धेनेति प्रचिन्त्य वै |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
नेमौ शक्यौ महेष्वासौ रणे क्षेपय़ितुं परैः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
२७४
मातलिरु उवाच
नेशुर्व्रह्मास्त्रनिर्दग्धा न च भस्माप्यदृश्यत ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
नेषुर्लिप्तो न कर्णी स्यादसतामेतदाय़ुधम् |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
नेष्यन्ति समरे सेनां भीमां यौधिष्ठिरीं नृप |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
३६
अर्जुन उवाच
नेष्यामि त्वां महावाहो पृथिव्यामपि युध्यताम् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
नेष्यामि मृत्युलोकाय़ेत्येवं मे मनसि स्थितम् ||
३१ ग
वन पर्व
अध्याय
२८१
यम उवाच
नेष्याम्येनमहं वद्ध्वा विद्ध्येतन्मे चिकीर्षितम् ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
नेह क्षत्तः कलहस्तप्स्यते मां; न चेद्दैवं प्रतिलोमं भविष्यत् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
५०
आस्तीक उवाच
नेह त्वदन्यो विद्यते जीवलोके; समो नृपः पालय़िता प्रजानाम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
नेह धर्मानृशंस्याभ्यां न क्षान्त्या नार्जवेन च |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२
कर्ण उवाच
नेह ध्रुवं किञ्चन जातु विद्यते; अस्मिँल्लोके कर्मणोऽनित्ययोगात् |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
नेह ध्रुवं किञ्चिदपि प्रचिन्त्यं; विदुर्लोके कर्मणोऽनित्ययोगात् |
४७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
नेह पश्यामि योद्धव्यं तव किञ्चिद्धनञ्जय़ |
३ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
नेह पश्यामि विवुधा राधेय़ममितौजसम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
नेह युक्तं चिरं स्थातुं जवेनातो व्रजेद्वुधः ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
नेह विश्वसितुं शक्यं भवतापि कुतो मय़ा ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५२
राक्षसा ऊचुः
नेह शक्यं मनुष्येण विहर्तुं मर्त्यधर्मिणा ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
नेह शक्यं रथैर्योद्धुं कुत एव महागजैः |
५८ क
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
नेह शस्त्रेण कर्तव्यं शान्तानामय़मालय़ः |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
नेह साधय़ते कार्यं समाय़ुक्तस्तु सिध्यति ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवाय़ो न विद्यते |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
राजो उवाच
नेहास्ति क्षत्रिय़ः कश्चित्सर्वे हीमे द्विजातय़ः ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
नेहास्ति धनुषा कार्यं न सङ्ग्रामेण कर्हिचित् |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
नेहास्ति पुरुषः कश्चिद्य इमं पापपूरुषम् |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
नेहास्य प्रतिय़ोद्धारमहं पश्यामि कौरवाः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
नेय़ं तव न चास्माकं न चान्येषां स्थिरा मता |
४५ क
विराट पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
नेय़ं पुरा जातु मय़ेह दृष्टा; राज्ञो विराटस्य निवेशने शुभा |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१५२
भीम उवाच
नेय़ं भवनमासाद्य कुवेरस्य महात्मनः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
पुत्र उवाच
नेय़ं मतिस्त्वय़ा वाच्या मातः पुत्रे विशेषतः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२७४
मातलिरु उवाच
नेय़ं माय़ा नरव्याघ्र रावणस्य दुरात्मनः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२५२
धौम्य उवाच
नेय़ं शक्या त्वय़ा नेतुमविजित्य महारथान् |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
नेय़ं सभा राजपुत्र न चाचार्यनिवेशनम् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
नेय़मस्ति मही कृत्स्ना यत्र दुर्योधनो नृपः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
७७
यय़ातिरु उवाच
नेय़माह्वय़ितव्या ते शय़ने वार्षपर्वणी ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
पराशर उवाच
नैःश्रेय़सं धर्मपथं समारुह्य यथाक्रमम् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
नैकं न चापरं केचिदुभय़ं च तथापरे ||
७ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
नैकतन्त्रविवुद्धेन दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
नैकत्र परिनिष्ठास्ति ज्ञानस्य पुरुषे क्वचित् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
भीष्म उवाच
नैकद्रव्योच्चय़वतीं समृद्धविपणापणाम् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
नैकधातुविचित्रैश्च पर्वतैरुपशोभितः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
नैकपक्षिगणाकीर्णां तपोवनमनोरमाम् |
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
नैकमिच्छेद्गणं हित्वा स्याच्चेदन्यतरग्रहः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
नैकरत्नविचित्रं तु काञ्चनं महदासनम् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
नैकरूपो वृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ||
४२ ख