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अनुशासन पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
तत्तेजस्तु ततो रौद्रं कपिला गा विशां पते |
२१ क
वन पर्व
अध्याय १९३
उत्तङ्क उवाच
तत्तेजस्त्वं समाधाय़ राजेन्द्र भुवि दुःसहम् |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
व्रह्मो उवाच
तत्तेजोऽग्निर्महद्भूतं द्वितीय़मिव पावकम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय २१५
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्तेन निखिलं सर्वमववुद्धं यथातथम् ||
७ ग
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्तेषां वानरेन्द्राणां पपात पवनोद्धुतम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
तत्तेऽनुपूर्व्या व्याख्यास्ये तदिहैकमनाः शृणु ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्तेऽस्तु सर्वं कौन्तेय़ यथा च स्वय़मिच्छसि ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
तत्तेऽहं कथय़िष्यामि यथाश्रुतमरिन्दम ||
२३ ग
आदि पर्व
अध्याय १६०
गन्धर्व उवाच
तत्तेऽहं कथय़िष्यामि शृणुष्वैकमना मम ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्तेऽहं नाशय़िष्यामि विधिदृष्टेन हेतुना |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय ७५
वृषपर्वो उवाच
तत्तेऽहं सम्प्रदास्यामि यदि चेदपि दुर्लभम् ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्तेऽहं सम्प्रदास्यामि सर्वमर्हति नो भवान् ||
४३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि कथं स्थैर्यं भवेत्तव ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २५
भीष्म उवाच
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि तदिहैकमनाः शृणु ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि तन्निवोध युधिष्ठिर ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३९
व्यास उवाच
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि तस्य व्याख्यामिमां शृणु ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि पृच्छते भरतर्षभ ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि पृच्छतो जनमेजय़ |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि प्रसादादमितौजसः ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि माहात्म्यं तस्य धीमतः ||
५२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यथावद्भरतर्षभ ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यथावन्मधुसूदन |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३८
व्यास उवाच
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ||
२० ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
वासुदेव उवाच
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणु शिष्य यथागमम् ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय १९९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्त्रिविष्टपसङ्काशमिन्द्रप्रस्थं व्यरोचत |
३५ क
वन पर्व
अध्याय १३३
अष्टावक्र उवाच
तत्त्रिषष्टिशतारं वै चक्रं पातु सदागति ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
तत्त्वं जिज्ञासतां पूर्वमृषीणां भावितात्मनाम् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
युधिष्ठिर उवाच
तत्त्वं जिज्ञासमानानां चक्षुर्भवतु नो भवान् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
युधिष्ठिर उवाच
तत्त्वं जिज्ञासमानानां चक्षुर्भवतु नो भवान् |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
तत्त्वं जिज्ञासमानानां चक्षुर्भवतु नो भवान् ||
४८ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
तत्त्वं जिज्ञासमानानां हेतुभिः सर्वतोमुखैः ||
८३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
तत्त्वं ज्ञात्वा तु सोमस्य विक्रय़ः स्याददूषकः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ||
११६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
तत्त्वं धर्मं विचरन्सञ्जय़ेह; मत्तश्च जानासि युधिष्ठिराच्च |
४ क
विराट पर्व
अध्याय ५५
कर्ण उवाच
तत्त्वं धर्मार्थवित्क्लिष्टः समय़ं भेत्तुमिच्छसि ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६५
भीष्म उवाच
तत्त्वं व्रूहि न भीः कार्या विश्रमस्व यथासुखम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ७२
केशिन्यु उवाच
तत्त्वं व्रूहि यथान्याय़ं वैदर्भी श्रोतुमिच्छति ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
तत्त्वं शास्त्रं व्रह्मवुद्ध्या व्रवीमि; सर्वं विश्वं व्रह्म चैतत्समस्तम् ||
८६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्त्वं शृणुष्व माद्रेय़ यदेतत्परिपृच्छसि |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
तत्त्वं सत्रप्रतिच्छन्ना मय़ि नार्हसि गूहितुम् ||
७१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
व्यास उवाच
तत्त्वं समादाय़ नरेन्द्र वित्तं; यजस्व देवांस्तर्पय़ानो विधानैः ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय १३४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्त्वगारमभिप्रेक्ष्य सर्वधर्मविशारदः |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
तत्त्वज्ञः सर्वभूतानां योगज्ञः सर्वकर्मणाम् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्त्वज्ञो जनको राजा लोकेऽस्मिन्निति गीय़ते |
३६ क
वन पर्व
अध्याय २१३
मार्कण्डेय़ उवाच
तत्त्वतः कामसन्तप्तं चिन्तय़ामास भामिनी ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७१
युधिष्ठिर उवाच
तत्त्वतः श्रोतुमिच्छामि गोदा यत्र विशन्त्युत ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
युधिष्ठिर उवाच
तत्त्वतो ज्ञातुमिच्छामि सर्वं मतिमतां वर ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
जनमेजय़ उवाच
तत्त्वतो वै समाचक्ष्व सर्वमध्वर्युसत्तम |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १६८
राजो उवाच
तत्त्वत्तः प्राप्तुमिच्छामि वरं वेदविदां वर ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
तत्त्वनिस्तत्त्वय़ोरेतत्पृथगेव निदर्शनम् |
४९ क