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वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
नैतदर्जुन देवेषु त्वय़ि वीर्यं यदीक्ष्यते ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १२
विदुर उवाच
नैतदस्तीति सक्रोधो भर्त्सय़ामास राक्षसम् ||
३८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १४
ऋषी ऊचतुः
नैतदस्त्रं मनुष्येषु तैः प्रय़ुक्तं कथञ्चन ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
नैतदस्त्रं मय़ा शक्यं द्विः प्रय़ोक्तुं जनार्दन |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
नैतदस्त्रं हि समरे शक्यं हन्तुं कथञ्चन ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
नैतदस्मत्कृतं शक्र नैतच्छक्र त्वय़ा कृतम् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
नैतदस्मत्कृतं शक्र नैतच्छक्र त्वय़ा कृतम् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
सञ्जय़ उवाच
नैतदस्योत्सहे सोढुं चरितं रणमूर्धनि |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
नैतदावर्तते राजन्नस्त्रं द्विर्नोपपद्यते |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
वैशम्पाय़न उवाच
नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
धृतराष्ट्र उवाच
नैतदीदृशकं युद्धं कृतवांस्तत्र फल्गुनः |
१० क
वन पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
नैतदुत्सहतेऽन्यो हि लव्धुमन्यत्र फल्गुनात् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७८
भीष्म उवाच
नैतदेवं पुनर्भावि व्रह्मर्षे किं श्रमेण ते ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय २०
अग्निरु उवाच
नैतदेवं यथा यूय़ं मन्यध्वमसुरार्दनाः |
८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
नैतदेवं यथात्थ त्वं पक्षपातेन केशव |
६ क
वन पर्व
अध्याय ७१
वृहदश्व उवाच
नैतदेवं स नृपतिस्तं सत्कृत्य व्यसर्जय़त् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय ११
मैत्रेय़ उवाच
नैतदौपय़िकं राजंस्त्वय़ि भीष्मे च जीवति |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २३३
वैशम्पाय़न उवाच
नैतद्गन्धर्वराजस्य युक्तं कर्म जुगुप्सितम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
अर्जुन उवाच
नैतद्गोप्स्यति दुर्वुद्धिमद्य वाणहतं मय़ा ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
नैतद्दृष्टं गदाय़ुद्धे कृतवान्यद्वृकोदरः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
यातुधान्यु उवाच
नैतद्धारय़ितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
यातुधान्यु उवाच
नैतद्धारय़ितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
यातुधान्यु उवाच
नैतद्धारय़ितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
यातुधान्यु उवाच
नैतद्धारय़ितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
यातुधान्यु उवाच
नैतद्धारय़ितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
यातुधान्यु उवाच
नैतद्धारय़ितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
यातुधान्यु उवाच
नैतद्धारय़ितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
यातुधान्यु उवाच
नैतद्धारय़ितुं शक्यं गच्छावतर पद्मिनीम् ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय १६८
वसिष्ठ उवाच
नैतद्रक्षो भय़ं यस्मात्पश्यसि त्वमुपस्थितम् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
नैतद्राजर्षिवृत्तं हि यत्र त्वं स्थातुमिच्छसि ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
नैतद्राज्ञामथो वृत्तं यथा त्वं स्थातुमिच्छसि ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
नैतद्रोचय़ते भीष्मो न द्रोणो विदुरो न च |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
नैतद्वलमसंवार्य शक्यो हन्तुं जय़द्रथः |
७४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
नैतद्विपन्नपूर्वं मे मित्रेष्वरिषु चोभय़ोः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय ४१
भगवानु उवाच
नैतद्वेद महेन्द्रोऽपि न यमो न च यक्षराट् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४४
सनत्सुजात उवाच
नैतद्व्रह्म त्वरमाणेन लभ्यं; यन्मां पृच्छस्यभिहृष्यस्यतीव |
२ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
नैतन्न्याय़्यं पय़ उपय़ोक्तुं भवतो मय़ाननुज्ञातमिति ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
नैतन्मनसि मे तात वर्तते कुरुसत्तम |
४५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
नैतन्मनसि मे राजन्वाशितं शकुनेरिव ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
नैतन्ममेति तन्मत्वा कुर्वीत प्रिय़मात्मनः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
नैतन्मे प्रिय़मित्येव स मां प्रीतोऽव्रवीत्तदा |
३९ ख
वन पर्व
अध्याय २३६
वैशम्पाय़न उवाच
नैतस्य कर्ता लोकेऽस्मिन्पुमान्विद्येत भारत |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
युधिष्ठिर उवाच
नैतस्य कश्चिद्वक्तास्ति श्रोता चापि सुदुर्लभः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४८
वासुदेव उवाच
नैतस्यान्योऽस्ति समरे प्रत्युद्याता धनञ्जय़ |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
अत्रिरु उवाच
नैतस्येह यथास्माकं क्षुधा वीर्यं समाहतम् |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
कश्यप उवाच
नैतस्येह यथास्माकं चत्वारश्च सहोदराः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
गौतम उवाच
नैतस्येह यथास्माकं त्रिकौशेय़ं हि राङ्कवम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
जमदग्निरु उवाच
नैतस्येह यथास्माकं भक्तमिन्धनमेव च |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
भरद्वाज उवाच
नैतस्येह यथास्माकं व्रह्मवन्धोरचेतसः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
विश्वामित्र उवाच
नैतस्येह यथास्माकं शश्वच्छास्त्रं जरद्गवः |
६ क