अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
वसिष्ठ उवाच
नैतस्येह यथास्माकमग्निहोत्रमनिर्हुतम् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
स्त्र्यु उवाच
नैता जानन्ति पितरं न कुलं न च मातरम् |
६६ क
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
नैताः शक्या मय़ा द्रष्टुं स्प्रष्टुं वाप्यनिमित्ततः |
४६ क
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
नैतादृशं दृष्टपूर्वं राजन्नैव च नः श्रुतम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२२३
द्रौपद्यु उवाच
नैतादृशं दैवतमस्ति सत्ये; सर्वेषु लोकेषु सदैवतेषु |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
नैतादृशं पुनर्युद्धं न भूतं न भविष्यति ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
नैतादृशं भारत युद्धमासी; द्यथाद्य कर्णार्जुनय़ोर्वभूव |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
नैतादृशं व्राह्मणस्यास्ति वित्तं; यथैकता समता सत्यता च |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
नैतादृशं समुद्योगं दृष्टवन्तोऽथ मानुषाः |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
नैतादृशानि युद्धानि भविष्यन्ति कथञ्चन ||
६४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
नैतादृशो जातु वभूव लोके; रथोत्तमो यावदनुश्रुतं नः |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
नैतादृशो दृष्टपूर्वः सङ्ग्रामो नैव च श्रुतः |
६० क
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
नैतादृशो हि योधोऽस्ति पृथिव्यामिह कश्चन |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
नैतानतिशय़ेज्जातु नात्यश्नीय़ान्न दूषय़ेत् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१७२
वैशम्पाय़न उवाच
नैतानि निरधिष्ठाने प्रय़ुज्यन्ते कदाचन ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
नैतानि वीरशय़्यासु युक्तरूपाणि पार्थिवाः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
नैतानि वेद यः कश्चिन्मुह्यन्त्यत्र प्रजा इमाः |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९८
नारद उवाच
नैतानि शक्यं निर्देष्टुं रूपतो द्रव्यतस्तथा |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
काश्यप उवाच
नैतानि सर्वाणि गतिर्भवन्ति; शीलव्यपेतस्य नरस्य राजन् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
नैतान्येकेन शक्यानि सातत्येनान्ववेक्षितुम् |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
नैतान्स्मरति कृत्येषु याचितश्चाभ्यसूय़ति |
७७ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
नैतान्हर्षसमाविष्टानिय़ं सेहे वसुन्धरा ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
नैताभ्यां भविता दोषः सकाशात्ते पुरन्दर |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
नैतामतिशय़े जातु वस्त्रभूषणभोजनैः |
३९ क
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
नैतावता कृतमित्यव्रवीत्तं; वृकोदरः संनिवृत्तार्धकाय़ः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
नैते कृतय़ुगे तात चरन्ति पृथिवीमिमाम् |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
नैते जातु निवर्तेरन्प्रेषिता हस्तिसादिभिः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
नैते जातु पुनर्युद्धमीहेय़ुरिति मे मतिः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३३
भीष्म उवाच
नैते देवैर्न पितृभिर्न गन्धर्वैर्न राक्षसैः |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
नैते महाभय़े प्राप्ते सम्प्रष्टव्याः कथञ्चन ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय
४४
शकुनिरु उवाच
नैते युधि वलाज्जेतुं शक्याः सुरगणैरपि |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१३०
धृतराष्ट्र उवाच
नैते विषममिच्छेय़ुर्धर्मय़ुक्ता मनस्विनः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९८
नारद उवाच
नैते शक्रेण नान्येन वरुणेन यमेन वा |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
श्रीभगवानु उवाच
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
नैते हास्यन्ति सङ्ग्रामं जीवन्त इति मे मतिः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
नैतेनातिथय़ो राजन्देवर्षिपितरस्तथा |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
नैतेष्वनुपविष्टेषु शक्यं केनचिदासितुम् |
४३ क
सभा पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
नैतेऽक्षा निशिता वाणास्त्वय़ैते समरे वृताः ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
नैतौ तरिष्यतो द्रोणमिति चक्रुस्तदा मतिम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
नैतौ प्रतिदेय़ौ वामदेवाय़ेति ||
५२ क
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
नैतौ शक्यौ दुराधर्षौ विजेतुमजितौ युधि |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
नैतौ सम्भवतो राजन्कथञ्चिदपि भारत |
४५ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
नैत्यकं भुञ्जते यस्तु मणिनागस्य मानवः ||
९१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
नैत्यकानि च सर्वाणि किमिच्छकमतीव च ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
नैतय़ोरन्तरं प्राप्य मुच्येतापि शतक्रतुः ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
नैनं जीवन्नापि जानाम्यजीव; न्वीभत्सुं वा तन्ममाद्यातिदुःखम् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
नैनं तस्माद्धनिष्यामि दृष्ट्वापि समरे स्थितम् ||
६५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
नैनं दुःशासनः सूतं नापि कश्चन सैनिकः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
नैनं निरीक्षितुं कश्चिच्छक्नोति द्रौणिमाहवे |
१०० ख