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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
नैनं निरीक्षितुमपि कश्चिच्छक्नोति पार्थिव ||
८४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
नैनं पश्याम संमर्दे धनुरेतत्प्रदृश्यते ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
नैनं प्रज्ञा सुनीतं वा त्राय़ते नापि पौरुषम् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
नैनं प्रज्ञा सुनीतं वा त्राय़ते नैव पौरुषम् ||
७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
नैनं मनुष्याः पश्यन्ति पश्यन्ति त्रिदिवौकसः ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
नैनं व्यालमृगा घ्नन्ति न पिशाचा न राक्षसाः |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
नैनं शक्तो हि सङ्ग्रामे जेतुं शक्रोऽपि पुत्रक ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय ६९
विदुर उवाच
नैनं शत्रुर्विषहते शक्रेणापि समोऽच्युत ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
नैनं शशंसिरे जेतुं दानवा वासवं यथा ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २
व्यास उवाच
नैनं शस्त्राणि भेत्स्यन्ति नैनं वाधिष्यते श्रमः |
१२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
नैनं शस्त्राणि विध्यन्ते न मृत्युश्चास्य विद्यते |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४३
सनत्सुजात उवाच
नैनं सामान्यृचो वापि न यजूंषि विचक्षण |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९५
वामदेव उवाच
नैनमन्येऽवजानन्ति नात्मना परितप्यते |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ४४
सूत उवाच
नैनमन्वागमिष्यामि कदाचिद्धि शपेत्स माम् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
नैनमभ्युत्सहन्केचित्तावका भरतर्षभ ||
१०८ ख
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
नैनमैच्छत्तदाख्यातुमनुक्रोशादनिन्दिता ||
९१ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
नैनां पश्यामीति ||
१११ घ
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
नैनानभ्युदिय़ात्सूर्यो न चाप्यासन्प्रगेनिशाः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
नैमिषं प्रार्थय़ानस्य पापस्यार्धं प्रणश्यति |
५४ क
शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
नैमिषे काञ्चनाक्षी तु मुनीनां सत्रय़ाजिनाम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४३
अतिथिरु उवाच
नैमिषे गोमतीतीरे तत्र नागाह्वय़ं पुरम् ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
नैमिषे मुनय़ो राजन्समागम्य समासते |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
नैमिषे स्वर्गतीर्थे च उपस्पृश्य जितेन्द्रिय़ः |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९८
नारद उवाच
नैरृता यातुधानाश्च व्रह्मवेदोद्भवाश्च ये ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०७
सुपर्ण उवाच
नैरृतानां सहस्राणि वहून्यत्र द्विजर्षभ |
८ क
वन पर्व
अध्याय २७१
मार्कण्डेय़ उवाच
नैरृतास्तत्र वध्यन्ते प्राय़शो न तु वानराः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
नैरृतीं दिशमास्थाय़ निपतेत्स त्वजिह्मगः ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९८
मनुरु उवाच
नैर्गुण्याद्व्रह्म चाप्नोति सगुणत्वान्निवर्तते |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
नैव ऋत्विङ्न चाचार्यो न राजा मधुसूदनः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
नैव कर्णो न ते पञ्च ददृशुर्वाणसंवृताः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
नैव कार्यं न चाकार्यं भोज्याभोज्यं न विद्यते ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
काल उवाच
नैव कालो न भुजगो न मृत्युरिह कारणम् |
७१ क
भीष्म पर्व
अध्याय २७
श्रीभगवानु उवाच
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
नैव कुन्तीसुतः पार्थो नैव कृष्णो जनार्दनः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
नैव क्रुध्यति न द्वेष्टि नानृता भाषते गिरः ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
नैव खं न दिशो राजन्न सूर्यं शत्रुतापन |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १११
नारद उवाच
नैव चासादय़ामास तथारूपांस्तुरङ्गमान् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
नैव चाहं स्त्रिय़ं जातु न स्त्रीपूर्वं कथञ्चन |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
नैव जातो न वाजात ईदृशं वक्तुमुत्सहेत् ||
७८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन |
१८ क
वन पर्व
अध्याय २४३
वैशम्पाय़न उवाच
नैव तस्य क्रतोरेष कलामर्हति षोडशीम् ||
३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३३४
वैशम्पाय़न उवाच
नैव तस्य परो लोको नाय़ं पार्थिवसत्तम |
५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
नैव तस्य वपुः शक्यं प्रवक्तुं वेष एव वा |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
नैव तस्य सुहृत्कश्चिन्न सम्वन्धी न वान्धवः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
नैव तस्योपमा काचित्सम्भवेदिति मे मतिः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
लुव्धक उवाच
नैव तावद्विदोषत्वं भवति त्वय़ि पन्नग ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
व्रह्मदत्त उवाच
नैव तिष्ठति तद्वैरं पुष्करस्थमिवोदकम् ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
नैव ते न वय़ं राजन्प्रज्ञासिष्म परस्परम् |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ११
वासुदेव उवाच
नैव ते निष्ठितं कर्म नैव ते शत्रवो जिताः |
५ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
नैव ते भ्रातरः स्थानं सम्प्राप्ताः कुरुनन्दन ||
३२ ख