वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
अनेन तव धर्मज्ञ प्रश्रय़ेण दमेन च |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१३९
देवा ऊचुः
अनेन तु गुरून्दुःखात्तोषय़ित्वा स्वकर्मणा |
२२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
अनेन तु ममाद्यापि व्यसनेनोपतापिता |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
यम उवाच
अनेन तुष्टोऽस्मि विनास्य जीवितं; वरं चतुर्थं वरय़स्व गच्छ च ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
उमा उवाच
अनेन ते महाभाग प्रतिषेधेन भागतः |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
२१६
वैशम्पाय़न उवाच
अनेन त्वं मनुष्याणां देवानामपि चाहवे |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
अनेन त्वं यदास्त्रेण सङ्ग्रामे विचरिष्यसि |
३० क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
इन्द्र उवाच
अनेन त्वं शरीरेण स्वर्गं गन्ता न संशय़ः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
अनेन दग्धा वर्षपूगान्विनाथा; वाराणसी नगरी सम्वभूव ||
७० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
धृतराष्ट्र उवाच
अनेन दुष्प्रणीतेन गता वैवस्वतक्षय़म् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
विरूप उवाच
अनेन धर्मप्राप्त्यर्थं शुभा दत्ता पुरानघ |
९१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
अनेन नित्यं साध्वी त्वं शीलवृत्तेन शोभसे |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४५
व्राह्मण उवाच
अनेन निश्चय़ेनाहं साध्वि सम्प्राप्तवानिह |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२८३
मार्कण्डेय़ उवाच
अनेन निश्चय़ेनेह वय़ं प्रस्थापिता नृप |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
अनेन नूनं वेदानां कृतमाहरणं रसात् |
६१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
नारद उवाच
अनेन प्रहृते पूर्वं वलभित्प्रहरत्युत ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९५
मनुरु उवाच
अनेन लिङ्गेन तु लिङ्गमन्य; द्गच्छत्यदृष्टः प्रतिसन्धिय़ोगात् ||
१५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
अनेन वचसा तुभ्यं दुःखितस्य जनेश्वर ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
अनेन वज्रप्रवरेण देव; भस्मीकुरुष्वाद्य सुरारिमुग्रम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
६६
सुदेव उवाच
अनेन वपुषा वाला पिप्लुनानेन चैव ह |
८ क
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
अनेन वाससाच्छन्नः स्वरूपं प्रतिपत्स्यसे |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
अनेन वास्य क्षुरनेमिनाद्य; सञ्छिन्द्धि मूर्धानमरेः प्रसह्य |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
अनेन वाहुवीर्येण मय़ा चाज्ञानुवर्तिना ||
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
अनेन विजिता गावो जिताश्च कुरवो युधि |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
अनेन विजिता लोकाः शक्रेणापि महात्मना ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
नारद उवाच
अनेन विजितानश्वैर्दोर्भ्यां जय़ति वासवः |
४ क
विराट पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
अनेन विद्धो मातङ्गो महानेकेषुणा हतः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
६७
दुःषन्त उवाच
अनेन विधिना कार्यो धर्मस्यैषा गतिः स्मृता ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
अनेन विधिना कार्ष्णिस्तदहःशेषमच्युतः |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
८३
नारद उवाच
अनेन विधिना यस्तु पृथिवीं सञ्चरिष्यति |
९८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
अनेन विधिना राजञ्जिगीषेतापि दुर्जय़ान् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
अनेन विधिना राजन्मय़ैतदुपपादितम् |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१३
जरत्कारुरु उवाच
अनेन विधिना शश्वन्न करिष्येऽहमन्यथा ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
अनेन विधिना सेय़ं मामर्चति शुभानना |
६५ क
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
अनेन वीर्येण कथं स्त्रिय़ं प्रार्थय़से वलात् |
५८ क
वन पर्व
अध्याय
१३४
अष्टावक्र उवाच
अनेन वै व्राह्मणाः शुश्रुवांसो; वादे जित्वा सलिले मज्जिताः किल |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
६७
शकुनिरु उवाच
अनेन व्यवसाय़ेन दीव्याम भरतर्षभ |
२० क
सभा पर्व
अध्याय
६७
शकुनिरु उवाच
अनेन व्यवसाय़ेन सहास्माभिर्युधिष्ठिर |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
अनेन व्यवहारेण द्रष्टव्यास्ते प्रजाः सदा ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२७४
मातलिरु उवाच
अनेन शक्रः काकुत्स्थ समरे दैत्यदानवान् |
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
अनेन सत्येन निहन्त्वय़ं शरः; सुदंशितः कर्णमरिं ममाजितः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
अनेन सह निर्गन्तुं न हि मे विरहः क्षमः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
अनेन साम्यं यास्यामि नानय़ाहमचेतसा |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
अनेन स्पृष्टनय़नो भूतान्यन्तर्हितान्युत |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
महेश्वर उवाच
अनेन हि तपस्तप्तं वलार्थममराधिप |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
अनेन हि मम भ्राता वको विनिहतः प्रिय़ः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
अनेन हि समाविष्टो वृत्रो धर्मभृतां वरः |
५६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
अनेन हि सहाय़ेन कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
अनेन हि हता वाल्ये पूतना शिशुना तथा |
४५ क