द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
नवभिश्च शितैर्वाणैश्चिच्छेद ध्वजमुच्छ्रितम् ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
नवमं च समासाद्य व्यसृजत्प्रतिघातिनम् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
नवमं पर्व निर्दिष्टमेतदद्भुतमर्थवत् |
१७६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
याज्ञवल्क्य उवाच
नवमं सर्गमित्याहुरेतदार्जवकं वुधाः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८७
भीष्म उवाच
नवम्यां कुर्वतः श्राद्धं भवत्येकशफं वहु |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
नवराष्ट्रं विनिर्जित्य कुन्तिभोजमुपाद्रवत् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१३४
वन्द्यु उवाच
नवाक्षरा वृहती सम्प्रदिष्टा; नवय़ोगो गणनामेति शश्वत् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
नवावतारं रूपस्य विक्रीणन्निव पाण्डवः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८०
पराशर उवाच
नवे कपाले सलिलं संन्यस्तं हीय़ते यथा |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८०
पराशर उवाच
नवेतरे तथाभावं प्राप्नोति सुखभावितम् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
नवैते तव वाहिन्यामुच्छ्रिताः परमध्वजाः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
१३४
वन्द्यु उवाच
नवैवोक्ताः सामिधेन्यः पितॄणां; तथा प्राहुर्नवय़ोगं विषर्गम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
नवोदितं सूर्यमिव प्रतापिनं; विचित्रतार्क्ष्यध्वजिनं पताकिनम् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
नव्यारण्यैर्न शक्येत गन्तुं मृगगणैरिव |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३१
भीष्म उवाच
नशेषमेवोपालभ्य न कुर्वन्तीति निश्चय़ः ||
१६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भरद्वाज उवाच
नश्यतीत्येव जानामि शान्तमग्निमनिन्धनम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७९
भरद्वाज उवाच
नश्यते कोष्ठभेदात्खमग्निर्नश्यत्यभोजनात् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
नश्यते नष्टमेवाग्रे लव्धव्यं लभते नरः ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
८५
यय़ातिरु उवाच
नश्यन्ति मानेन तमोऽभिभूताः; पुंसः सदैवेति वदन्ति सन्तः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
नश्यन्त्यर्थास्तथा भोगाः स्थानमैश्वर्यमेव च |
१०० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७९
भरद्वाज उवाच
नश्यन्त्यापो ह्यनाहाराद्वाय़ुरुच्छ्वासनिग्रहात् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
नश्येदभिमृशन्सद्यो मृगः कूटमिव स्पृशन् |
५२ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
नष्टं च भारतं वंशं पुनरेव समुद्धर ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
२०७
अग्निरु उवाच
नष्टकीर्तिरहं लोके भवाञ्जातो हुताशनः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
१९५
भीष्म उवाच
नष्टकीर्तेर्मनुष्यस्य जीवितं ह्यफलं स्मृतम् ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
नष्टचन्द्रा यथा रात्रिः सेनेय़ं हतनाय़का |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७६
भृगुरु उवाच
नष्टचन्द्रार्कपवनं प्रसुप्तमिव सम्वभौ ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
नष्टचित्तस्ततः सोऽथ वभूव जगतीपतिः ||
१०८ ग
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
नष्टचित्तानिवोन्मत्ताञ्शोकेन भृशपीडितान् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
नष्टपानीय़यवसे मृगैरन्यैश्च वर्जिते |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
नष्टप्रज्ञः पापमेव नित्यमारभते नरः ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
नष्टप्रज्ञो यदा भवति तदा न्याय़ं न पश्यति |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
नष्टप्रभ इवादित्यः सर्वतो लोहिता दिशः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
नष्टमात्मनि संलीनं नाधिजग्मुर्हुताशनम् ||
२१ ग
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
नष्टशत्रुर्यदा स्कन्दः प्रय़ातश्च महेश्वरम् |
७२ क
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
नष्टसञ्ज्ञे निपतिते तदा सौभपतौ नृप ||
१९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
नष्टसञ्ज्ञेषु देवेषु न प्रज्ञाय़त किञ्चन ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४८
नागभार्यो उवाच
नष्टस्यार्थस्य सम्प्राप्तिं कृत्वा फलमुपाश्नुते ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
स्थाणुरु उवाच
नष्टा न पुनरेष्यन्ति प्रजा ह्येताः कथञ्चन |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
नष्टां च धरणीं पूर्वमविन्दं वै गुहागताम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
नष्टात्मा कलिना स्पृष्टस्तत्तद्विगणय़न्नृपः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
महेश्वर उवाच
नष्टादित्ये तथा लोके तमोभूते नगात्मजे |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
महेश्वर उवाच
नष्टालोकस्ततो लोकः क्षणेन समपद्यत ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
नष्टाय़ां प्रतिपत्तौ तु मोहवश्या नरास्तदा |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
नष्टे देवासुरगणे यक्षराक्षसवर्जिते ||
७७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
नष्टे देवासुरगणे समुत्सन्नमहोरगे ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
युधिष्ठिर उवाच
नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
नष्टे व्रह्मणि धर्मे च देवास्त्रासमथागमन् |
२२ क