सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
नोक्तपूर्वमिदं जातु यदिदं प्रार्थितं त्वय़ा ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७२
भीमसेन उवाच
नोग्रं दुर्योधनो वाच्यः साम्नैवैनं समाचरेः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
नोचतुर्विवृतं किञ्चिन्न ह्येष तव निश्चय़ः ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
नोचुर्वचः साध्वथ वाप्यसाधु; महीक्षितो धार्तराष्ट्रस्य भीताः ||
२२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१४
धृतराष्ट्र उवाच
नोचुर्वाष्पकलाः किञ्चिद्वीक्षां चक्रुः परस्परम् ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
नोचुस्ते वचनं किञ्चित्तमृषिं साध्वसाधु वा ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
नोच्छिन्द्यादात्मनो मूलं परेषां वापि तृष्णय़ा |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
नोच्छ्रितं सहते कश्चित्प्रक्रिय़ा वैरकारिका |
५७ क
वन पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
नोत्कण्ठा फल्गुने कार्या कृतास्त्रः शीघ्रमेष्यति ||
३० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
नोत्तरं प्रतिपेदे च तत्र युक्तं ह्रिय़ा वृतः |
५५ क
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
नोत्तरं प्रतिवक्तुं च शक्तोऽभूज्जनमेजय़ ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
नोत्थापय़ामि भर्तारं सुखसुप्तमहं सदा |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९६
मनुरु उवाच
नोत्सहन्ते यथा वेत्तुमिन्द्रिय़ैरिन्द्रिय़ाण्यपि |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
वासुदेव उवाच
नोत्सहन्ते रणे जेतुं किमुतैकः सुय़ोधनः ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
नोत्सहे कुरुभिर्योद्धुं रोमहर्षं हि पश्य मे |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
नोत्सहे जीवितुमहं त्वद्विहीनो नरर्षभ |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
अभिमन्युरु उवाच
नोत्सहे तु विनिर्गन्तुमहं कस्याञ्चिदापदि ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
नोत्सहे परिभोगाय़ श्वावलीढं हविर्यथा ||
१३ ख
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
नोत्सहे समभित्यक्तुं दैवमूलमतः परम् ||
३५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
नोत्सहेताभ्यतिक्रान्तुं वेलामिव महोदधिः ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
नोत्सहेऽनर्थसंय़ुक्तां वाचं श्रोतुं कथञ्चन ||
२२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
नोत्सहेऽहं परित्यक्तुं मातरं पार्थिवर्षभ |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
नोत्सहेऽहमनिवेद्योपाध्याय़ाय़ोपय़ोक्तुमिति ||
७४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
नोत्सहेय़ं पुनर्गन्तुं स्वजनं प्रति तापसाः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
नोत्सादमगमच्चेदं कदाचिदिह नः कुलम् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
नोत्सार्यः पथिकः कश्चित्तेभ्यो दास्याम्यहं वसु |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
२४४
वैशम्पाय़न उवाच
नोत्सीदेम महाराज क्रिय़तां वासपर्ययः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
नोत्सृजेत पुरीषं च क्षेत्रे ग्रामस्य चान्तिके |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
१९०
मार्कण्डेय़ उवाच
नोत्स्रक्ष्येऽहं वामदेवस्य वाम्यौ; नैवंविधा धर्मशीला भवन्ति ||
६८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
नोदकक्लिन्नगात्रस्तु स्नात इत्यभिधीय़ते |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
नोद्धर्तुमशकद्भीमो दोर्भ्यामपि महावलः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
नोद्यन्तारं धुरं तस्य कञ्चिन्मेने प्रजापतिः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
नोद्यमेन न होत्राभिः सर्वाः स्वीकुरुते प्रजाः ||
६७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
नोद्विग्नाः परचक्राणामनय़ानामकोविदाः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
नोद्वेजय़ति भूतानि न विहिंसय़ते तथा |
३८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
नोपगच्छन्ति वै शान्तिमभिमन्युविनाकृताः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
नोपघातस्त्वय़ा ग्राह्यो राजन्मैत्रीमिहेच्छता ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
नोपपत्त्या न वा युक्त्या त्वसद्व्रूय़ादसंशय़म् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
नोपभोगात्परं किञ्चिद्धनिनो वाधनस्य वा ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
नोपलेभे ततः शान्तिं सम्प्रदानं विचिन्तय़न् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
नोपलेभे स्मृतिं धीमानभिज्ञातुं तमात्मजम् ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
नोपशाम्यति निर्घोषो धनुषां कूजतां तथा |
२२ क
मौसल पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
नोपशाम्यति शव्दश्च स दिवारात्रमेव हि ||
४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
यक्षा ऊचुः
नोपसर्पति तेनासौ सव्रीडः स्त्रीस्वरूपवान् ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
नोपसर्पति मां चापि कस्मादद्य सुमन्दधीः ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
नोपसेवन्ति राजेन्द्र सर्गं मूत्रपुरीषय़ोः ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
नोपालभे त्वां नृपते विराट जनसंसदि |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
नोपावर्तन्त शकुना जातप्राणाः स्म ते यदा ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९४
कर्ण उवाच
नोपाय़साध्याः कौन्तेय़ा ममैषा मतिरच्युत ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
नोपेक्षस्व महावाहो पश्यमानः कुलक्षय़म् |
२३ क