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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
व्रह्मो उवाच
नोपैति यावदध्यात्मं तावदेतान्न पश्यति |
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय ७८
यय़ातिरु उवाच
नोपैति स च धर्मेषु भ्रूणहेत्युच्यते वुधैः ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
नोपय़च्छेत तां जातु पुत्रिकाधर्मिणी हि सा ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
नोभय़ं शव्दविज्ञाने विज्ञानस्येतरस्य वा ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
नोरःसु यावद्योधानां महेष्वासैर्महेषवः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
नोर्ध्वं नावाङ्न तिर्यक्च न क्वचिच्छक्र कामय़े |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
नोवाच किञ्चित्कौरव्यस्ततो द्वैपाय़नोऽव्रवीत् ||
१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
नोवाच किञ्चिद्गान्धारी निःश्वासपरमा भृशम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
नोवाच भगवान्किञ्चिद्ध्यानमेवान्वपद्यत ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
नोवाच वचनं किञ्चिद्भीष्मं भीमपराक्रमम् ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
नोवाच वाग्यतः किञ्चिद्गच्छत्येव युधिष्ठिरः ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८
संवर्त उवाच
नोष्णं न शिशिरं तत्र न वाय़ुर्न च भास्करः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९५
मनुरु उवाच
नोष्णं न शीतं मृदु नापि तीक्ष्णं; नाम्लं कषाय़ं मधुरं न तिक्तम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
नौत्सुक्यं नृत्तगीतेषु न राग उपजाय़ते ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
नौपम्यं विद्यते यस्य त्रिषु लोकेषु किञ्चन ||
१५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
नौर्नावीव निवद्धा हि स्रोतसा सनिवन्धना |
४१ क
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
नौर्मत्स्यस्य वचः श्रुत्वा शृङ्गे हिमवतस्तदा ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
नौश्च कारय़ितव्या ते दृढा युक्तवटाकरा |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
नौषधानि न शास्त्राणि न होमा न पुनर्जपाः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय १८५
मार्कण्डेय़ उवाच
नौस्थश्च मां प्रतीक्षेथास्तदा मुनिजनप्रिय़ |
३१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
न्यकृन्तदसिना द्रौणिरसिमार्गविशारदः ||
६३ ख
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
न्यकृन्तद्गार्ध्रपत्रेण भीष्मस्यामिततेजसः ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
न्यकृन्तन्नुत्तमाङ्गानि काय़ेभ्यो हय़सादिनाम् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
न्यकृन्तन्नुत्तमाङ्गानि विचरन्तो दिशो दश ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
न्यगृह्णं सह दैतेय़ैस्तत्पुरं भरतर्षभ ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
न्यगृह्णन्दानवा घोरा रथचक्रे च भारत ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
न्यगृह्णन्वहवो राजञ्शलभान्वाय़सा इव ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५०
भीष्म उवाच
न्यग्भावं परमं वाय़ोः शल्मले त्वमुपागतः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ११९
भीष्म उवाच
न्यग्भूतास्तत्पराः क्षान्ताश्चौक्षाः प्रकृतिजाः शुभाः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
न्यग्रोधं तत्र चापश्यत्कङ्कालं राजधर्मणः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
न्यग्रोधं विपुलच्छाय़ं रमणीय़मुपाद्रवत् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
न्यग्रोधं सुमहान्तं वै विशालं पृथिवीपते ||
८१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
न्यग्रोधमण्डलं सर्वं सञ्छन्नं सर्वतोऽभवत् ||
४१ ग
आदि पर्व
अध्याय ३९
तक्षक उवाच
न्यग्रोधमेनं धक्ष्यामि पश्यतस्ते द्विजोत्तम ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
न्यग्रोधरूपो न्यग्रोधो वृक्षकर्णस्थितिर्विभुः |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
न्यग्रोधशाखासञ्छन्ने निर्भुक्तस्रग्विभूषिते ||
१७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
न्यग्रोधस्य ततः शाखां प्रार्थय़ामास भारत ||
३८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४३
व्रह्मो उवाच
न्यग्रोधो जम्वुवृक्षश्च पिप्पलः शाल्मलिस्तथा |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
न्यग्रोधोदुम्वरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ||
१०१ ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
न्यदधुः पाण्डवास्तस्मिन्नाश्रमे वृषपर्वणः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
न्यपतंश्चात्र नभसः समन्तात्पुष्पवृष्टय़ः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय २०
सूत उवाच
न्यपतत्तुरगाभ्याशे नचिरादिव शीघ्रगा ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
न्यपतत्स रथे मूढो धनुरुत्सृज्य वीर्यवान् ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
न्यपतद्धरणीपृष्ठे महोल्केव गतप्रभा ||
३१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
न्यपतन्त तदा भूमौ शतशोऽथ सहस्रशः ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय १६
सूत उवाच
न्यपतन्पतगोपेताः पर्वताग्रान्महाद्रुमाः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
न्यपातय़ंस्तदा युद्धे नराः स्म विजय़ैषिणः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११९
सञ्जय़ उवाच
न्यपातय़च्च समरे सौमदत्तिः शिनेः सुतम् ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
न्यपातय़च्छितैः शस्त्रैः सेनय़ोरुभय़ोरपि ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
न्यपातय़द्धय़ाञ्शीघ्रं यतमानस्य मारिष |
५७ ख