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उद्योग पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
न्यस्तशस्त्रा वय़ं ते वाप्युपजीवाम माधव ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
न्यस्तशस्त्राय़ुधाः श्रान्ताः शोणिताक्तपरिच्छदाः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
न्यस्तशस्त्रे च भवति हतो भीष्मः पितामहः |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
न्यस्तशस्त्रे ततो भीष्मे निहतान्पश्य पाण्डवान् |
१३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
अश्वत्थामो उवाच
न्यस्तशस्त्रो मम पिता धृष्टद्युम्नेन पातितः ||
१७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
न्यस्तशस्त्रो मम पिता धृष्टद्युम्नेन पातितः ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
न्यस्तशस्त्रौ ततस्तौ तु नादहदस्त्रजोऽनलः |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
न्यस्तश्चात्मा सुविषमे कृच्छ्रमापादिता वय़म् ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय ६०
प्रातिकाम्यु उवाच
न्यस्ताः पूर्वं भ्रातरस्तेन राज्ञा; स्वय़ं चात्मा त्वमथो राजपुत्रि ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
न्यस्तानि न पुनस्तेषां त्यागः स्वर्गाद्विधीय़ते ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
न्यस्तासना माल्यवती सुगन्धा; तामभ्ययुस्ते नरराजवर्याः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
न्यस्यात्मनि स्वय़ं वेदान्वुद्ध्या समनुचिन्तय़ ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६१
कर्ण उवाच
न्यस्यामि शस्त्राणि न जातु सङ्ख्ये; पितामहो द्रक्ष्यति मां सभाय़ाम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
न्यस्याय़ुधं रणे द्रोण समेत्यास्मानवस्थितान् |
९० क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
न्यस्याय़ुधममोघेषो तिष्ठ वर्त्मनि शाश्वते |
९२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
न्यस्याय़ुधानि विश्वेश जगतो हितकाम्यया ||
५६ ग
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
न्यहनं दानवान्सर्वान्मुहूर्तेनैव भारत ||
४९ ग
वन पर्व
अध्याय २३०
वैशम्पाय़न उवाच
न्यहनंस्तत्तदा सैन्यं रथैर्गरुडनिस्वनैः ||
१७ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
न्यहनच्च पिता पुत्रं पुत्रश्च पितरं रणे |
४६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
न्यहनत्तावकं सैन्यं वज्रपाणिरिवासुरम् ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
न्यहनत्तावकांश्चापि सात्यकिः सत्यविक्रमः |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
न्यहनत्पाण्डवीं सेनां वज्रहस्त इवासुरीम् |
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
न्यहनत्पाण्डवो युद्धे तापय़ंस्तव वाहिनीम् ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
न्यहनद्द्विषतां व्रातान्गतासूनन्तको यथा ||
६२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
न्यहनन्पाण्डवीं सेनां शतशोऽथ सहस्रशः ||
५५ ग
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
न्यासं निर्यातय़ामास युक्तः परमय़ा मुदा ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
न्यासभूतान्यथाकालं वन्धूनिव सुसत्कृतान् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
न्यासापहर्ता तु नरो यमस्य विषय़ं गतः |
५७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
न्यासापहारिणां ये च श्रुतं नाशय़तां च ये |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
न्यासाय़ैवाभवद्वुद्धिः प्रणीता तस्य पाण्डव ||
९५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
न्यासितः समरे शस्त्रं भीष्मेण भरतर्षभ ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
न्यासय़ां चक्रिरे शस्त्रं पितरो भृगुनन्दनम् ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
न्यासय़ामासुरथ तां शिविकां सत्यवादिनः |
१७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
न्याय़तः श्वशुरे वृत्तिं प्रय़ुज्य प्रय़युस्ततः |
५० क
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
न्याय़तत्त्वार्थविज्ञानसम्पन्नैर्वेदपारगैः ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
न्याय़तन्त्राण्यनेकानि तैस्तैरुक्तानि वादिभिः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
न्याय़तस्ते महाभागे संशय़ः समुदीरितः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
न्याय़तो दुष्कृते घातः सुकृते स्यात्कथं वधः |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय ७८
शर्मिष्ठो उवाच
न्याय़तो धर्मतश्चैव चरन्ती न विभेमि ते ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३२
दुर्योधन उवाच
न्याय़तो युध्यमानस्य देवेष्वपि पुरन्दरः ||
४८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
न्याय़तो युध्यमानस्य प्राणत्यागो न संशय़ः |
४६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
न्याय़तो युध्यमानानां कृती ह्येष महावलः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय ३७
सूत उवाच
न्याय़तो रक्षितास्तेन तस्य पापं न रोचय़े ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
न्याय़निर्वापणः पादः पण्डितो ह्यचलोपमः |
१२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
न्याय़पूर्वमसंरव्धमसम्भ्रान्तमिदं वचः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४१
भीष्म उवाच
न्याय़प्राप्तेन वित्तेन स्वेन शीलेन चान्वितः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
न्याय़युक्तं च चित्रं च फल्गुनार्थे यशस्करम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २०४
मार्कण्डेय़ उवाच
न्याय़युक्तमिदं सर्वं भवता परिकीर्तितम् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११३
वृहस्पतिरु उवाच
न्याय़लव्धं प्रदातव्यं द्विजेभ्यो ह्यन्नमुत्तमम् |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
नकुल उवाच
न्याय़लव्धस्य सूक्ष्मस्य विप्रदत्तस्य यद्द्विजाः ||
१ ख