आदि पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
न कश्चिदकरोदीर्ष्यामभवन्धर्मवुद्धय़ः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
न कश्चिदस्ति पापानां धर्म इत्येष निश्चय़ः ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
न कश्चिदाहरत्तत्र सहस्रावरमर्हणम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२००
मार्कण्डेय़ उवाच
न कश्चिदीशते व्रह्मन्स्वय़ङ्ग्राहस्य सत्तम |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
न कश्चिदेनं समरे प्रत्युद्याति महारथः |
७७ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
न कश्चिद्गुणसम्पन्नः प्रकाशो भुवि दृश्यते ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
न कश्चिद्वरय़ामास तेजसा प्रतिवारितः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
न कश्चिद्व्रजति ह्यस्मिन्क्षेमेण भरतर्षभ ||
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
न कश्चिन्नापनय़ते पुमानन्यत्र भार्गवात् |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
न कस्यचित्स्पृहय़ते नावजानाति किञ्चन |
५ क
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
न कस्यचिद्ददन्मार्गं गच्छ तातोत्तरां दिशम् |
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
हंस उवाच
न कस्यचिन्मित्रमथो दुरात्मा; कलाश्चैता अधमस्येह पुंसः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६
द्रुपद उवाच
न कस्याञ्चिदवस्थाय़ां राज्यं दास्यन्ति वै स्वय़म् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
न काङ्क्षे विजय़ं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च |
३२ क
विराट पर्व
अध्याय
११
नकुल उवाच
न कातरं स्यान्मम जातु वाहनं; न मेऽस्ति दुष्टा वडवा कुतो हय़ाः |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
न कामकारात्कामोऽन्यः संसेव्यो धर्मदर्शिभिः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
न कामपरमो वा स्यात्सर्वान्सेवेत सर्वदा ||
३८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
३८
पञ्चचूडो उवाच
न कामभोगान्वहुलान्नालङ्कारार्थसञ्चय़ान् |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
न काममर्थलिप्सूनां वचनं कर्तुमर्हसि ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६८
भीष्म उवाच
न कामाननुरुध्येत दुःखं कामेषु वै रतिः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
न कामार्थं सन्त्यजेय़ुर्हि धर्मं; पाण्डोः सुताः सर्व एवेन्द्रकल्पाः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
भीष्म उवाच
न कामेषु न भोगेषु नैश्वर्ये न सुखे तथा |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय
७९
तुर्वसुरु उवाच
न कामय़े जरां तात कामभोगप्रणाशिनीम् |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
न कामय़े नरश्रेष्ठ जीवितं पृथिवीं तथा |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
न कामय़े भर्तृविनाकृता श्रिय़ं; न भर्तृहीना व्यवसामि जीवितुम् ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
न कामय़े भर्तृविनाकृता सुखं; न कामय़े भर्तृविनाकृता दिवम् |
५२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६
वृहस्पतिरु उवाच
न कामय़े याजय़ितुं त्वामहं पृथिवीपते |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
न कामय़े सुखान्भोगानैश्वर्यं वा त्वदाश्रय़म् ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
३०
सूत उवाच
न कार्यं तव सोमेन मम सोमः प्रदीय़ताम् |
७ ख
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
न कार्यं न च मर्यादां नरः क्रुद्धोऽनुपश्यति ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४४
भीष्म उवाच
न कार्यमिह मे नाथ जीवितेन त्वय़ा विना |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२८०
सावित्र्यु उवाच
न कार्यस्तात सन्तापः पारय़िष्याम्यहं व्रतम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
न कार्या वः कथञ्चित्स्यात्तत्राभिसरणे मतिः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२३१
वैशम्पाय़न उवाच
न कालः परुषस्याय़मिति राजाभ्यभाषत ||
२१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२
विदुर उवाच
न कालस्य प्रिय़ः कश्चिन्न द्वेष्यः कुरुसत्तम |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
न कालो दण्डमुद्यम्य शिरः कृन्तति कस्यचित् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
न कालोऽद्य विषादस्य भय़स्य मरणस्य वा ||
३६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
न किञ्चित्कस्यचित्कुर्वन्निर्भय़ः शुचिरावसेत् ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
न किञ्चित्प्रत्यपद्यन्त पुत्रास्तव च भारत ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
न किञ्चित्प्रत्यपद्यन्त पुत्रास्ते भरतर्षभ |
१०२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
न किञ्चित्प्रत्यपश्याम शुभं वा यदि वाशुभम् ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
न किञ्चिदनुपश्यामि जीवितत्राणमात्मनः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
न किञ्चिदपि पश्यामो हृतदृष्टिवलेन्द्रिय़ाः ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
न किञ्चिदवमन्यन्ते पण्डिता भरतर्षभ ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय
५९
विदुर उवाच
न किञ्चिदीड्यं प्रवदन्ति पापं; वनेचरं वा गृहमेधिनं वा |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२५२
वैशम्पाय़न उवाच
न किञ्चिदीड्यं प्रवदन्ति पापं; वनेचरं वा गृहमेधिनं वा |
३ क
वन पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
न किञ्चिदुक्त्वा दुर्मेधास्तस्थौ किञ्चिदवाङ्मुखः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
न किञ्चिदुपजीवन्ति दक्षा उत्थानशीलिनः ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८२
भीष्म उवाच
न किञ्चिद्दुर्लभं चैव गवां भक्तस्य भारत ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
न किञ्चिद्दुर्लभं तस्य यस्य त्वं पुरुषर्षभ ||
१७ ख