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भीष्म पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
न तं पश्यामि कौन्तेय़ यो मां युध्यन्तमाहवे |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
सञ्जय़ उवाच
न तं पश्यामि लोकेषु चिन्तय़न्पुरुषं क्वचित् |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
न तं पश्यामि लोकेषु यो मां हन्यात्समुद्यतम् |
८० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
न तं पश्यामि लोकेऽस्मिंस्त्वत्तोऽप्यन्यं धनुर्धरम् |
२३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ४
कृप उवाच
न तं पश्यामि लोकेऽस्मिन्यो मां कार्यान्निवर्तय़ेत् |
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५८
वासुदेव उवाच
न तं पश्याम्यहं युद्धे पाण्डवं योऽभ्ययाद्रणे ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५०
भीष्म उवाच
न तं पश्याम्यहं वृक्षं पर्वतं वापि तं दृढम् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
न तं भर्तारमिच्छन्ति षण्ढं पतिमिव स्त्रिय़ः ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
भीम उवाच
न तं युद्धेषु पश्यामि यो विभिन्द्याच्छिखण्डिनम् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय २९८
युधिष्ठिर उवाच
न तं योगं प्रपश्यामि येन स्युर्विनिपातिताः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
न तं स ममृषे भीमः सिंहनादं महारणे |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
न तं समय़मादृत्य राज्यमिच्छति पैतृकम् |
११ क
सभा पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
न तं सूतं प्रत्युवाच वचनं साध्वसाधु वा ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय १४८
वैशम्पाय़न उवाच
न तच्छक्यं त्वय़ा द्रष्टुं रूपं नान्येन केनचित् |
५ क
वन पर्व
अध्याय २९०
वैशम्पाय़न उवाच
न ततर्प च रूपेण भानोः सन्ध्यागतस्य सा ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
न ततोऽस्ति तपो भूय़ इति धर्मविदो विदुः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
जनमेजय़ उवाच
न ततोऽस्ति परं मन्ये पावनं दिवि चेह च ||
६ ग
आदि पर्व
अध्याय ५६
जनमेजय़ उवाच
न तत्कारणमल्पं हि धर्मज्ञा यत्र पाण्डवाः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
न तत्किञ्चिदसौवर्णं रन्तिदेवस्य धीमतः ||
११८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ८६
दुर्योधन उवाच
न तत्कुर्याद्वुधः कार्यमिति मे निश्चिता मतिः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०९
सुपर्ण उवाच
न तत्केनचिदन्येन गतपूर्वं द्विजर्षभ |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
न तत्क्रतुशतेनापि तुल्यमाहुर्मनीषिणः ||
९१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
न तत्खनेद्यस्य न मूलमुत्खने; न्न तं हन्याद्यस्य शिरो न पातय़ेत् ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३८
भीष्म उवाच
न तत्तरेद्यस्य न पारमुत्तरे; न्न तद्धरेद्यत्पुनराहरेत्परः |
६८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
न तत्तिष्ठति तुष्टानां वने मूलफलाशिनाम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
न तत्त्वय़ा कृतं कर्म येनाहं निर्जितः पुरा |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११४
वृहस्पतिरु उवाच
न तत्परस्य सन्दद्यात्प्रतिकूलं यदात्मनः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
न तत्परस्य सन्दध्यात्प्रतिकूलं यदात्मनः |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५१
भीष्म उवाच
न तत्परेषु कुर्वीत जानन्नप्रिय़मात्मनः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
न तत्पुरुषकारेण न च दैवेन केनचित् |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २७
व्राह्मण उवाच
न तत्प्रविश्य शोचन्ति न प्रहृष्यन्ति च द्विजाः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ७४
शुक्र उवाच
न तत्प्राज्ञोऽनुकुर्वीत विदुस्ते न वलावलम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
न तत्फलमवाप्नोति तीर्थाभिगमनेन यत् ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
न तत्फलमवाप्नोति भूमिदानाद्यदश्नुते ||
७० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
न तत्र कर्णं न द्रोणं नार्जुनं न युधिष्ठिरम् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
न तत्र कर्मणो व्यापत्कथञ्चिदपि विद्यते ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
न तत्र कश्चित्किञ्चिद्धि व्याजहार पुमान्क्वचित् ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
न तत्र कश्चित्सङ्ग्रामे शशाकार्जुनमीक्षितुम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
न तत्र कश्चिद्दुर्वर्णो व्याधितो वाप्यदृश्यत |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
न तत्र कश्चिद्वक्तुं हि वाचं प्राक्रामदग्रतः ||
६२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
न तत्र कश्चिन्नविषण्ण आसी; दृते राजन्सोमदत्तस्य पुत्रात् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४९
भीष्म उवाच
न तत्र कारणं रेतः स क्षेत्रस्वामिनो भवेत् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
न तत्र किल्विषं किञ्चित्कर्तुर्भवति भारत ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
न तत्र कूटं पापं वा वञ्चना वापि दृष्यते |
४४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
न तत्र कृपणः कश्चिन्न दरिद्रो वभूव ह |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
न तत्र क्रमते कालो न जरा न च पापकम् |
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
व्रह्मो उवाच
न तत्र क्रमते मृत्युर्न जरा न च पावकः |
३८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
न तत्र क्रमते वुद्धिर्नेन्द्रिय़ाणि न देवताः |
४८ क
आदि पर्व
अध्याय १८४
वैशम्पाय़न उवाच
न तत्र दुःखं च वभूव तस्या; न चावमेने कुरुपुङ्गवांस्तान् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १४८
हनूमानु उवाच
न तत्र धर्माः सीदन्ति न क्षीय़न्ते च वै प्रजाः |
११ क