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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
धृतराष्ट्र उवाच
न तत्र धृतराष्ट्रस्ते शक्यो द्रष्टुं महामुने ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१९
भीष्म उवाच
न तत्र पक्षिसङ्घातो न शव्दो नापि दर्शनम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
भीष्म उवाच
न तत्र पशुघातोऽभूत्स राजैवं स्थितोऽभवत् |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
न तत्र पाण्डवा गृद्धाः शृणु राजन्वचो मम |
३ क
विराट पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
न तत्र पाण्डवा राजन्नापि कृष्णा पतिव्रता |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
न तत्र प्रलपेत्प्राज्ञो वधिरेष्विव गाय़नः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
न तत्र राजा राजेन्द्र न दण्डो न च दण्डिकाः |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४९
भीष्म उवाच
न तत्र रेतः क्षेत्रं वा प्रमाणं स्याद्युधिष्ठिर ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १८५
वैशम्पाय़न उवाच
न तत्र वर्णेषु कृता विवक्षा; न जीवशिल्पे न कुले न गोत्रे ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
न तत्र वासं कुर्वीत श्रेय़ोर्थी वै कथञ्चन ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
न तत्र विपणः कार्यः खरकण्डूय़ितं हि तत् ||
६४ ख
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
न तत्र विषय़स्त्वासीन्मम सैन्यस्य भारत |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६५
भीष्म उवाच
न तत्र व्याजहारान्यद्गोत्रमात्रादृते द्विजः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
न तत्र शक्यते गन्तुं यक्षराक्षसदानवैः |
२० क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
न तत्र शोको दैन्यं वा वैवर्ण्यं चोपलक्ष्यते |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
न तत्र संविभज्यते स्वकर्मणा परस्परम् |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
न तत्र संविभज्यते स्वकर्मभिः परस्परम् |
४६ क
वन पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
न तत्र सूर्यः सोमो वा द्योतते न च पावकः |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
न तत्र सूर्यस्तपति न ते जीर्यन्ति मानवाः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
नारद उवाच
न तत्र सूर्यस्तपति न सोमोऽभिविराजते |
४६ क
वन पर्व
अध्याय २२
वासुदेव उवाच
न तत्र सौभं न रिपुं न शाल्वं; पश्यामि वृद्धं पितरं न चापि ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
भीष्म उवाच
न तत्रानिच्छतस्तस्य भिद्येरन्सर्वसेतवः ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १७
सिद्ध उवाच
न तत्राप्यस्ति सन्तोषो दृष्ट्वा दीप्ततरां श्रिय़म् |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
न तत्राभ्यधिकः कश्चित्सर्वे ते समतेजसः ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
न तत्रासीत्पुमान्कश्चित्पाण्डवानां विशां पते |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
न तत्रासीत्पुमान्कश्चिद्यो योद्धुं नाभिकाङ्क्षति ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
न तत्रासीदधर्मिष्ठमशस्त्रं युद्धमेव च |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
न तत्रासीन्महाराज सोमकानां महारथः |
७५ क
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
न तत्रोपविशेज्जातु स राजवसतिं वसेत् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
न तत्सम्प्राप्नुते कश्चिदृते ह्यावां द्विजोत्तम ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८२
पराशर उवाच
न तत्सेवेत मेधावी न तद्धितमिहोच्यते ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८०
पराशर उवाच
न तत्सेवेत मेधावी शुचिः कुसलिलं यथा ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
न तत्सौहृदमन्येषु मय़ा शैनेय़ लक्षितम् |
६४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
न तथा गच्छति रथस्तपनस्य विशां पते |
११ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
न तथा घ्राणय़ुक्ताश्च सर्वगन्धा विशां पते |
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६
द्रुपद उवाच
न तथा ते करिष्यन्ति सेनाकर्म न संशय़ः ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
न तथा तेन तप्यामि यथा राजंस्त्वय़ाद्य वै ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय १९३
उत्तङ्क उवाच
न तथा दृश्यतेऽरण्ये मा ते भूद्वुद्धिरीदृशी ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
न तथा दृष्टपूर्वोऽन्यः कश्चिदुग्रतपा इति ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय ३२
भीम उवाच
न तथा धार्तराष्ट्रस्य मा कार्षीर्माधव व्यथाम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २४०
वैशम्पाय़न उवाच
न तथा पाण्डुपुत्राणां स्नेहवन्तो विशां पते |
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
कर्ण उवाच
न तथा पाण्डुपुत्राणामेवं युद्धमवर्तत ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७८
नकुल उवाच
न तथा प्रणय़ो राज्ये यथा सम्प्रति वर्तते ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २२७
वैशम्पाय़न उवाच
न तथा प्राप्नुय़ां प्रीतिमवाप्य वसुधामपि |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
जनमेजय़ उवाच
न तथा फलदं चापि नाराय़णकथा यथा ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
न तथा मन्यते कृष्णो राजानं पाण्डवं पुरा |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
न तथा मानुषे लोके भय़मस्ति शुभाशुभे |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
न तथा रमणीय़ं मे तमृते सव्यसाचिनम् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १९८
वैशम्पाय़न उवाच
न तथा राज्यसम्प्राप्तिस्तेषां प्रीतिकरी मता |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय २८८
हंस उवाच
न तथा वक्तुमिच्छन्ति कल्याणान्पुरुषे गुणान् |
२३ क