शान्ति पर्व
अध्याय
३१९
भीष्म उवाच
व्यवसाय़ेन लोकांस्त्रीन्सर्वान्सोऽथ विचिन्तय़न् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
जनक उवाच
व्यवसाय़ेन शुद्धेन मद्विधैश्छिन्नसंशय़ः |
४६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
व्यवसाय़ो जय़ो धर्मः सिद्धिर्लक्ष्मीर्धृतिः स्मृतिः |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
व्यवसाय़ो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः |
५५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
व्यवसीदामि दुःखेन न च मे जीवितं प्रिय़म् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
९७
वैशम्पाय़न उवाच
व्यवस्थानं च ते धर्मे कुलाचारं च लक्षय़े |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
व्यवस्थानमथाकाङ्क्षन्धनञ्जय़शरैर्हतम् |
६४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
व्यवस्थाप्य महावाहुस्तव पुत्रस्य वाहिनीम् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
व्यवस्थाप्य रथं सज्जं शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
व्यवस्थापय़ति क्षिप्रमिमं लोकं नरेश्वर |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
व्यवस्थाय़ां च मित्रेषु वुद्धिविक्रमय़ोस्तथा |
१०२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
व्यवस्थितः कुरुमित्रो नरेन्द्र; व्यभ्रे सूर्यो भ्राजमानो यथा वै ||
९७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
व्यवस्थिता ये तु सैन्ये नराग्र्याः; प्रहारिणो मानिनः सत्यसन्धाः ||
१०३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
शल्य उवाच
व्यवस्थिता योत्स्यमानाः सर्वेऽर्जुनसमा युधि ||
६६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
व्यवस्थिता हि पाञ्चालाः पुनरेव जय़ैषिणः ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
व्यवस्थिताः प्रतिव्यूह्य तव पुत्रस्य वाहिनीम् ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
व्यवस्थितानि सर्वाणि शकटे सूचिरक्षिणः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
व्यवस्थिते वले तस्मिन्नस्त्रे प्रतिहते तथा |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
व्यवस्थितो नागकुलस्य मध्ये; यथा महेन्द्रः कुरुराजो जय़ाय़ ||
१०५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
व्यवस्थितौ चित्रसेनेन सार्धं; हृष्टात्मानौ समरे योद्धुकामौ ||
१०० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
व्यवस्य मनसः शान्तिमगच्छत्पाण्डुनन्दनः ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२०
वैशम्पाय़न उवाच
व्यवस्य व्राह्मणापत्यं धनुर्वेदान्तगस्य तत् |
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
व्यवस्य सर्वमस्तीति नास्तिक्यं भावमुत्सृज ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
व्यवस्ये वुद्धिपूर्वं वै तद्भवाननुमन्यताम् ||
६२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
व्यवहारं गदाय़ुद्धे पार्थिवस्य च घातनम् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
व्यवहारः प्रजागोप्ता व्रह्मदिष्टो युधिष्ठिर |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
व्यवहारः सुसूक्ष्मश्च तथा कण्टकशोधनम् |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
व्यवहारः स्मृतो यश्च स वेदविषय़ात्मकः ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
व्यवहारप्रवृत्तानां तन्निवोध युधिष्ठिर ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८९
मार्कण्डेय़ उवाच
व्यवहाररता वैश्या भविष्यन्ति कृते युगे |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
व्यवहारश्च नगरे यस्य कर्मफलोदय़ः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
व्यवहारश्च यो दृष्टः स धर्म इति नः श्रुतः |
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
व्यवहारस्तु वेदात्मा वेदप्रत्यय उच्यते |
४९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
व्यवहारस्थितिर्धर्मः सत्यवाक्यरतिस्तथा ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
व्यवहारस्य चाख्यानाद्व्यवहार इहोच्यते ||
१२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
व्यवहाराश्च ते तात नित्यमाप्तैरधिष्ठिताः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
व्यवहारेण शुद्धेन प्रजापालनतत्परः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
व्यवहारेषु धर्म्येषु निय़ोज्याश्च वहुश्रुताः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
व्यवहारेषु सततं तत्र राज्यं व्यवस्थितम् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
व्यवहारोऽत्र कार्त्स्न्येन धर्मार्थीय़ो निदर्शितः |
२०२ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
व्यवहार्यश्च राजेन्द्र शुचिश्चैव भविष्यसि |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
व्यवातिष्ठत्ततो योधान्वासविः परवीरहा ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
व्यवाय़ं कुरुते नित्यं धीरो भूतानि धारय़न् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
व्यशातय़च्च सङ्क्रुद्धो धृष्टद्युम्नममर्षणः ||
१२३ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
व्यशातय़च्छरांस्तांस्तु द्रोणः समितिशोभनः |
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
व्यशीर्यत ततो राष्ट्रं क्षय़ैर्नानाविधैस्तथा |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
व्यशीर्यत दिशो राजन्वातनुन्ना इवाम्वुदाः ||
७४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
व्यशीर्यत रणे राजंस्ताराजालमिवाम्वरात् ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
व्यशीर्यत सनादा च तदा भरतसत्तम ||
३९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
व्यशीर्यत सपाञ्चाला वातेनेव वलाहकाः ||
३४ ख