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अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
अनय़ा छन्द्यमानोऽहं भार्यया तव सत्तम |
६४ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
अनय़ा पितृभक्त्या च विक्रमेण च ते विभो |
२४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
अनय़ा शक्यमद्येह श्रूय़तां च वचो मम ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
अनय़ा सह लोकांश्च गन्तासि तपसार्जितान् |
८४ क
आदि पर्व
अध्याय ७६
शुक्र उवाच
अनय़ा सह सम्प्रीतिमतुलां समवाप्स्यसि ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
अनय़ा हि तपस्विन्या तपस्तप्तं सुदुश्चरम् |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
अनय़ाः सम्प्रवर्तेरन्भवेद्वै वर्णसङ्करः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
अनय़ाहं वशीभूतः कालमेतं न वुद्धवान् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
अनय़ेनोपवर्तन्ते तद्राज्ञः किल्विषं महत् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
अनय़ो देवलोकस्य सहसैव व्यदृश्यत |
५० क
सभा पर्व
अध्याय ४५
धृतराष्ट्र उवाच
अनय़ो दैवविहितो न कथञ्चिद्भविष्यति ||
५५ ख
सभा पर्व
अध्याय ७२
धृतराष्ट्र उवाच
अनय़ो नय़सङ्काशो हृदय़ान्नापसर्पति ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
अनय़ो नय़सङ्काशो हृदय़ान्नापसर्पति ||
७९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४१
कृष्ण उवाच
अनय़ो नय़सङ्काशो हृदय़ान्नापसर्पति ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
अनय़ो योऽय़मागन्ता पुत्राणां ते दुरात्मनाम् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५०
नाग उवाच
अनय़ोः को भवेत्सूर्यो रथस्थो योऽय़मागतः ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
अनय़ोर्वीरय़ोर्युद्धे को ज्याय़ान्भवतो मतः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
अनय़ोस्तु निवोध त्वं वचनं वाक्यकण्ठय़ोः ||
१९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
अपः पीत्वा पय़ोमिश्रा योगी वलमवाप्नुय़ात् ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२६
व्यास उवाच
अपः प्रदाय़ शीतोष्णा नाकपृष्ठे महीय़ते ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
व्रह्मो उवाच
अपः संसृज्य तेजोभिस्तेन सन्तापिता वय़म् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
भीष्म उवाच
अपः सञ्चिन्तय़ामास ध्यातास्ताश्चाप्यथागमन् ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
अपः सृष्ट्वा ह्यात्मभूरात्मय़ोनिः; पुराकरोत्सर्वमेवाथ विश्वम् ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९८
सूर्य उवाच
अपकारिणं तु मां विद्धि भगवञ्शरणागतम् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
अपकृत्ताश्च पतिता मुसलानि गुरूणि च |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
अपकृत्य परेषां हि विश्वासाद्दुःखमश्नुते ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
अपकृत्य वलस्थस्य दूरस्थोऽस्मीति नाश्वसेत् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
अपकृत्यापि सततं सान्त्वय़न्ति निरर्थकम् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
अपकृत्वा महत्तात सोढुं शक्ष्यन्ति मामकाः ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
अपकृत्वा वुद्धिमतो दूरस्थोऽस्मीति नाश्वसेत् |
८ क
सभा पर्व
अध्याय ३९
शिशुपाल उवाच
अपकृष्टाः सतां मार्गान्मन्यन्ते तच्च साध्विति ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय १५४
व्राह्मण उवाच
अपकृष्टाम्वरां दृष्ट्वा तामृषिश्चकमे ततः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय २०६
वैशम्पाय़न उवाच
अपकृष्टो महावाहुर्नागराजस्य कन्यया |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १३
अर्जुन उवाच
अपकृष्टोत्तरासङ्गः कृशो धमनिसन्ततः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ६७
वृहदश्व उवाच
अपकृष्य च लज्जां मां स्वय़मुक्तवती नृप |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
अपकृष्यमाणः कौन्तेय़ो नदत्येव महारथः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२९
भीष्म उवाच
अपक्रमितुमिच्छेद्वा यथाकामं तु सान्त्वय़ेत् |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
अपक्रम्य तु ते तूर्णं तस्मादाय़ोधनान्नृप |
४३ क
स्त्री पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
अपक्रम्य तु ते राजन्सर्व एव महारथाः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय १४४
वैशम्पाय़न उवाच
अपक्रम्य यय़ू राजंस्त्वरमाणा महारथाः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
अपक्रम्य स भीमस्य मुहूर्तं शरगोचरात् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६८
सञ्जय़ उवाच
अपक्रान्तः स्वधर्माच्च क्षत्रधर्ममुपाश्रितः |
२४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
अपक्रान्तस्ततो यज्ञो मृगो भूत्वा सपावकः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
अपक्रान्तास्तुमुले संविमर्दे; सुदारुणे भारत मोहनीय़े ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
अपक्रान्ते च काकुत्स्थे सीता वश्या भविष्यति ||
१२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
अपक्रान्ते ततस्तस्मिन्द्रोणपुत्रे महारथे |
२६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
अपक्रान्ते ततो यज्ञे सञ्ज्ञा न प्रत्यभात्सुरान् |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
अपक्रान्ते तव सुते हय़पृष्ठं समाश्रिते ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
युय़ुत्सुरु उवाच
अपक्रान्ते तु नृपतौ स्कन्धावारनिवेशनात् |
८७ क
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
अपक्रान्ते नले राजन्दमय़न्ती गतक्लमा |
१ क