अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
गालव उवाच
न तात तरुणं दान्तं पिता त्वां पश्यतेऽनघ ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
२६
मार्कण्डेय़ उवाच
न तात हृष्यामि न च स्मय़ामि; प्रहर्षजो मां भजते न दर्पः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
न तादृक्कदनं राजन्कृतवांस्तत्र फल्गुनः |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२८
सञ्जय़ उवाच
न तादृशं रणे कर्म कृतवन्तस्तु तावकाः |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
न तादृशा विनश्यन्ति नापि यान्ति पराभवम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
न ताननुवसेज्जातु ते हि पापकृतो जनाः ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
११३
विभाण्डक उवाच
न तानि सेवेत मुनिर्यतात्मा; सतां लोकान्प्रार्थय़ानः कथञ्चित् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
न तान्वलस्थान्वाल्येऽपि जघ्नुर्भरतसत्तम ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
न तान्सञ्जीवय़ामास वृहस्पतिरुदारधीः ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
६१
भीम उवाच
न ताभिरुत दीव्यन्ति दय़ा चैवास्ति तास्वपि ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
न तामालक्षय़ामासुर्लघुतां शीघ्रकारिणः ||
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४४
सनत्सुजात उवाच
न तारकासु न च विद्युदाश्रितं; न चाभ्रेषु दृश्यते रूपमस्य |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
न तावदभिषज्येते व्यावर्तदथ भास्करः ||
४८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४१
हिडिम्व उवाच
न तावदेतान्हिंसिष्ये स्वपन्त्वेते यथासुखम् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
न तावन्मृत्युकालो मे पुनरागमनं कुरु ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
न तासां नामधेय़ानि परिमाणं तथैव च |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
न तासां रक्षणं कर्तुं शक्यं पुंसा कथञ्चन |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
न तासां सदृशीं मन्ये त्वामहं मत्तकाशिनि ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३४
भीष्म उवाच
न तिष्ठति तथासीत नासुप्ते प्रस्वपेत च ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
न तिष्ठति स्म सन्मार्गे न च धर्मं वुभूषति ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
न तु कार्या त्वरा यावदिति मे निश्चिता मतिः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
न तु कुण्डे पय़ोभावः पय़श्चापि न मक्षिकाः |
१७९ क
वन पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
न तु कुर्युः शराः शेषमस्तास्तात किरीटिना ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
न तु कृत्स्नं जगच्छक्तं भस्म कर्तुं जनार्दनम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
न तु केवलदैवेन प्रजा भावेन रेमिरे |
१० क
वन पर्व
अध्याय
२३३
वैशम्पाय़न उवाच
न तु गन्धर्वराजस्य सैनिका मन्दचेतसः |
१० क
मौसल पर्व
अध्याय
७
वसुदेव उवाच
न तु गर्हामि शैनेय़ं हार्दिक्यं चाहमर्जुन |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
न तु ग्रन्थस्य तत्त्वज्ञो यथावत्त्वं नरेश्वर ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
न तु जात्या समा लोके व्राह्मण्याः क्षत्रिय़ा भवेत् |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५१
धृतराष्ट्र उवाच
न तु जेतार्जुनस्यास्ति हन्ता चास्य न विद्यते |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
न तु तं ममृषे भीमः सिंहनादं तरस्विनाम् ||
६० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
न तु तं मर्षय़ामास भीमसेनो महावलः |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
न तु तत्त्वेन भगवन्धर्मान्वेत्सीति मे मतिः ||
४० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
न तु तत्प्रत्यसूय़ामो न हि सर्वं विधीय़ते ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
५९
नल उवाच
न तु तत्र गमिष्यामि विषमस्थः कथञ्चन ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२१५
मार्कण्डेय़ उवाच
न तु तत्स्वाहय़ा कर्म कृतं जानाति वै जनः ||
३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
न तु तन्निकृतिप्रज्ञे कौरव्ये प्रतितिष्ठति ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
न तु तन्ममृषे कर्णो धनुषश्छेदनं तथा |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
न तु तन्ममृषे भीमः शत्रोर्विजय़लक्षणम् |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८६
दुर्योधन उवाच
न तु तस्मिन्प्रदेय़ं स्यात्तथा कार्यगतिः प्रभो |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४१
व्यास उवाच
न तु ताम्यति वै विद्वान्स्थले चरति तत्त्ववित् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
वासुदेव उवाच
न तु तावदहं मन्ये प्राप्तकालं तवानघ |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
१९९
द्रुपद उवाच
न तु तावन्मय़ा युक्तमेतद्वक्तुं स्वय़ं गिरा ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
न तु तुष्यति यस्यैष पुरुषस्य दुरात्मनः |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
राम उवाच
न तु ते जय़माशासे त्वां हि जेतुमहं स्थितः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
द्रोण उवाच
न तु ते युधि सन्त्रासः कार्यः पार्थात्कथञ्चन |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
न तु ते विक्रमः कश्चिद्दृश्यते वलमेव वा ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०९
मृग उवाच
न तु ते व्रह्महत्येय़ं भविष्यत्यविजानतः |
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२४
विनतो उवाच
न तु ते व्राह्मणं हन्तुं कार्या वुद्धिः कथञ्चन |
३ क
विराट पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
न तु तेषां गतिर्वासः प्रवृत्तिश्चोपलभ्यते |
१५ क