अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
सुपार्श्वं विपुलस्कन्धं सुरूपं चारुदर्शनम् ||
१०८ ख
विराट पर्व
अध्याय
३८
उत्तर उवाच
सुपार्श्वं सुग्रहं चैव कस्यैतद्धनुरुत्तमम् ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
सुपार्श्वश्च सुवाहुश्च पौरवश्च महारथः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
सुपुङ्खैः कङ्कवासोभिर्यत्कर्णं छादय़च्छरैः ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०९
सञ्जय़ उवाच
सुपुङ्खैर्दुर्मुखं भीमः शरैर्निन्ये यमक्षय़म् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१८४
सरस्वत्यु उवाच
सुपुण्यगन्धाभिरलङ्कृताभि; र्हिरण्यवर्णाभिरतीव हृष्टः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
गौतम उवाच
सुपुष्पितं किंनरराजजुष्टं; प्रिय़ं वनं नन्दनं नारदस्य |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
सुपुष्पितः पर्णधरोऽतिकाय़ो; वातेरितः शाल इवाद्रिशृङ्गात् ||
६१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
सुपुष्पितः स्यादफलः फलवान्स्याद्दुरारुहः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
सुपुष्पितवने काले कदाचिन्मधुमाधवे |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
सुपुष्पिताशोकपलाशशाल्मलि; र्यथाचलः स्पन्दनचन्दनाय़ुतः ||
३८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
सुपुष्पितो मारुतवेगताडितो; महावने साल इवावघूर्णितः ||
६१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
सुपुष्पितो मारुतवेगरुग्णो; महीधराग्रादिव कर्णिकारः ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
सुपुष्पौ पुष्पसमय़े पुष्पिताविव किंशुकौ ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
सुपूजितं देवगणैर्महात्मभिः; शिवादिभिर्भारत पुण्यकर्मभिः |
४१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
सुपूजिते स्वय़ं कुन्त्या पार्थस्य प्रिय़काम्यया ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
सुपूरा वै कुनदिका सुपूरो मूषिकाञ्जलिः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
सुपूर्णाय़तमुक्तैस्तानव्यवच्छिन्नपिण्डितैः |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
सुप्तं चापि पुनः सर्पैस्तीक्ष्णदंष्ट्रैर्महाविषैः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
२८२
सावित्र्यु उवाच
सुप्तं चैनं यमः साक्षादुपागच्छत्सकिङ्करः |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
सुप्तं ददृशतुः कृष्णं शय़ानं चोपजग्मतुः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
सुप्तं ममर्द सहसा चेष्टमानं महीतले ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
सुप्तं वाथ प्रमत्तं वा यथा हन्याद्विषेण वा |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
पुत्र उवाच
सुप्तं व्याघ्रं महौघो वा मृत्युरादाय़ गच्छति ||
१७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
सुप्तं शिविरमाविश्य पाण्डूनां कदनं कृतम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२८२
सत्यवानु उवाच
सुप्तश्चाहं वेदनय़ा चिरमित्युपलक्षय़े |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
सुप्ता सुशरणा प्रीता श्वो गमिष्यामि मैथिल ||
१९० ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
सुप्तांश्चैनानभ्यगच्छद्धिडिम्वा नाम राक्षसी ||
८६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
सुप्ताञ्जघान सुवहून्वाय़सान्वाय़सान्तकः ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
सुप्तामुत्सृज्य तां भार्यां विलप्य करुणं वहु ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
सुप्तामुत्सृज्य विपिने गतो यः पुरुषः स्त्रिय़म् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
सुप्तामुत्सृज्य वैदर्भीं प्राद्रवद्गतचेतनः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
सुप्तास्तु ते पार्थिव सर्व एव; कृष्णा तु तेषां चरणोपधानम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
सुप्ताय़ां दमय़न्त्यां तु नलो राजा विशां पते |
८ क
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
सुप्ते सार्थे परिश्रान्ते हस्तिय़ूथमुपागमत् |
६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
सुप्तेषु तेषु काकेषु विस्रव्धेषु समन्ततः |
३६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
सुप्तोत्थित इवोत्तस्थौ मृष्टलोहितलोचनः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१९५
मार्कण्डेय़ उवाच
सुप्तोऽभूद्राजशार्दूल कालानलसमद्युतिः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
सुप्तोऽस्मि यदि मां कश्चिद्वोधय़ेदिति पार्थिव ||
१५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
सुप्तौ प्रावोधय़त्तौ तु मातुलं भोजमेव च ||
५४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
सुप्यतां पार्थ भद्रं ते कल्याणाय़ व्रजाम्यहम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
सुप्रज्ञमपि चेच्छूरमृद्धिर्मोहय़ते नरम् |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
अष्टावक्र उवाच
सुप्रज्ञाता सुप्रशान्ता शेषा गच्छन्तु च्छन्दतः ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
सुप्रणीतेन दण्डेन प्रिय़ाप्रिय़समात्मना |
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
सुप्रणीतो वलौघो हि कुरुते कार्यमुत्तमम् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
सुप्रतीककुले जाता महापद्मकुले तथा ||
२४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
सुप्रतीकस्तथा राजन्प्रभिन्नकरटामुखः ||
३३ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
सुप्रतीकेन तांश्चापि भगदत्तोऽप्युपाद्रवत् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
सुप्रतीकेन नागेन सह शस्तः किरीटिना ||
१६१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
सुप्रतीतमना नित्यं यः प्रय़च्छति मानवः |
५ क