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आदि पर्व
अध्याय २०१
नारद उवाच
तत्र तत्र महापानैरुत्कृष्टतलनादितैः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तत्र महापानैरुत्कृष्टतलनादितैः |
५४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्र मही कीर्णा विवर्हैरण्डजैरिव ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्र महेष्वासैः श्वसद्भिः शोणितोक्षितैः |
४९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
तत्र तत्र युधां श्रेष्ठः परिभूय़ न संशय़ः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तत्र वसन्तश्च शनैर्जग्मुर्महारथाः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय २१७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तत्र विघूर्णन्तः पुनरग्नौ प्रपेदिरे ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तत्र विविक्तेषु समन्तादुपशोभितम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
तत्र तत्र विसृष्टेषु दुर्जय़ेष्वकृतात्मभिः ||
५६ ख
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्र व्यदृश्यन्त पुरुषाः शूरमानिनः ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्र व्यमुह्यन्त वनदाहे यथा द्विपाः |
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
तत्र तत्र श्रुतो मोक्षे कथ्यमानस्त्रिदण्डिभिः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २९९
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तत्र सपत्नानां निग्रहार्थं महात्मभिः ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तत्र सरिच्छ्रेष्ठा ससर्ज सुवहून्रसान् ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तत्र सुखो वाय़ुः सर्वं चासीत्प्रदक्षिणम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्र स्म ते शूरा निपतन्ति पतङ्गवत् ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय २१७
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तत्र स्म दृश्यन्ते विनश्यन्तः शरीरिणः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्र स्म पाञ्चाल्यो धृष्टद्युम्नोऽथ धीय़ते ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्र स्म लीय़न्ते भय़े जाते महारथाः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्र हतैश्चापि मनुष्यगजवाजिभिः |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्र हि दृश्यन्ते धातवः पाञ्चभौतिकाः |
१० क
वन पर्व
अध्याय २०२
व्याध उवाच
तत्र तत्र हि दृश्यन्ते धातवः पाञ्चभौतिकाः |
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
तत्र तत्र हि पश्यामि कर्णमेवाग्रतः स्थितम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय ९८
लोमश उवाच
तत्र तत्रानुचरितं शार्दूलभय़वर्जितैः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्रापविद्धानि व्यदृश्यन्त महाहवे ||
५४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्रापविद्धैश्च वाहुभिश्चन्दनोक्षितैः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्राभ्यवेक्षामः सङ्घान्कर्णेन पातितान् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्रार्जुनरथं प्रभाते द्रक्ष्यसेऽग्रतः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तत्रैव जाय़ेते युद्धकाले पुनः पुनः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्रैव दीर्यन्ते सेनास्तव विशां पते ||
५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्रैव दृश्यन्ते पतिताः पार्थसाय़कैः ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्रैव दृश्यन्ते रथवारणपत्तय़ः |
८३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्रैव दृश्यन्ते साय़ुधाः साङ्गदैर्भुजैः ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
तत्र तत्रैव धावन्तः समदृश्यन्त भारत ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१९
नमुचिरु उवाच
तत्र तत्रैव वसति न यत्र स्वय़मिच्छति ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
तत्र तत्रैव सक्ताभून्न चचाल च पश्यताम् ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
तत्र तल्लाघवं दृष्ट्वा वीभत्सोरतिमानुषम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
तत्र तस्याः समभवद्गर्भो ज्वलनसंनिभः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय २०६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तस्याद्भुतं कर्म शृणु मे जनमेजय़ |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
भीष्म उवाच
तत्र तस्यासतः कालः समतीतोऽभवन्महान् ||
१० ग
द्रोण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
तत्र तस्योपविष्टस्य भूषणानि महात्मनः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
तत्र ता विविधैर्भावैर्लोभय़न्त्यो वराङ्गनाः |
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय ४२
सूत उवाच
तत्र तां भैक्षवत्कन्यां प्रादात्तस्मै महात्मने |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तानि दृढैः पाशैः सुगाढं पर्यवन्धत ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
तत्र तान्प्रवहो वाय़ुः प्रतिगृह्णाति भारत |
७१ क
आदि पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तान्वासय़ामास पाण्डवानमितौजसः |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तित्तिरिकल्माषान्मण्डूकाक्षान्हय़ोत्तमान् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
तत्र तिष्ठन्ति कौरव्य चत्वारो लोकसंमताः |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तिष्ठन्स दाशार्हो राजमध्ये परन्तपः |
४० क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र तीरे सरस्वत्याः पुण्ये सर्वगुणान्विते |
५२ क