आदि पर्व
अध्याय
१०१
वैशम्पाय़न उवाच
न किञ्चिद्वचनं राजन्नवदत्साध्वसाधु वा ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
न किञ्चिद्विषय़ं भुक्त्वा स्पृहय़ेत्तस्य वै पुनः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
न किलातप्ततपसा शक्यते द्रष्टुमञ्जसा |
३० क
विराट पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
न कीचकः स्वधर्मस्थो न च मत्स्यः कथञ्चन |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
३१
सूत उवाच
न कीर्तय़िष्ये सर्वेषां प्राधान्येन तु मे शृणु ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
न कीर्तय़ेत दत्त्वा यः स च पापात्प्रमुच्यते ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
न कुणपाः शृङ्गिणो वा न देवा न च मानुषाः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
न कुण्ड्यां नोदके सङ्गो न वाससि न चासने |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
न कुत्सय़ाम्यहं किञ्चिन्न गर्हे वलवत्तरम् |
२२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
न कुन्ती न च पाञ्चाली न चोलूपी न सात्वती |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
न कुप्यवेतनी कश्चिन्न चातिक्रान्तवेतनी |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
शङ्ख उवाच
न कुप्ये तव धर्मज्ञ न च दूषय़से मम |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
प्रजापतिरु उवाच
न कुप्ये न च मे कामो न भवेरन्प्रजा इति |
३ क
विराट पर्व
अध्याय
३९
अर्जुन उवाच
न कुर्यां कर्म वीभत्सं युध्यमानः कथञ्चन |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
जनमेजय़ उवाच
न कुर्वन्ति कथं विप्रा अन्ये नानाव्रते स्थिताः ||
६२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
न कुर्वन्ति वचो मह्यं कुरवः कालचोदिताः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
न कुर्वीतान्तरं राष्ट्रे राजा परिगते क्षुधा ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
न कुलं न वलं राजन्नभिजानंस्तथात्मनः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
न कुलं वृत्तहीनस्य प्रमाणमिति मे मतिः |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
न कूटमानैर्वणिजः पण्यं विक्रीणते तदा ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
न कृतं यत्त्वय़ा पूर्वं प्राप्ताप्राप्तविचारणे ||
२५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
न कृतं यत्पुरा कैश्चित्कर्म लोके महर्षिभिः |
२४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
न कृतं वचनं तेन तव पुत्रेण भारत ||
२५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१
धृतराष्ट्र उवाच
न कृतं सुहृदां वाक्यं जामदग्न्यस्य जल्पतः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
न कृतस्य न कर्तुश्च सख्यं सन्धीय़ते पुनः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
न कृपं मद्रराजं वा कृतवर्माणमेव च ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
न कृशां पापवत्सां वा वन्ध्यां रोगान्वितां तथा |
५१ क
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
न कृष्ण धर्मश्चरितो भवाय़; जन्तोरधर्मश्च पराभवाय़ |
५ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
न कृष्णा राजपुत्री च नरकार्हा युधिष्ठिर |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
न कृष्णो न च कौन्तेय़ो न चान्यः शस्त्रभृद्रणे |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
न केतुर्दृश्यते राज्ञः कर्णेन निहतः शरैः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
न केनचन वृत्तेन ह्यवज्ञेय़ो गुरुर्भवेत् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
न केनचित्प्रवादेन सत्येनैवापहारिणा |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
न केनचिदुपाय़ेन कुरूणां दृश्यते जय़ः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
न केनचिद्याचितव्यः कश्चित्किञ्चिदनापदि |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
न केवलं वय़ं कामाच्चेदिराज जनार्दनम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
युधिष्ठिर उवाच
न केवलं श्राद्धधर्मे पुण्यकेष्वपि दीय़ते |
२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
न कोपः पाण्डवे कार्यो गान्धारि शममाप्नुहि |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
न कोपाद्व्याहरन्ते ये वाचं हृदय़दारणीम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
न कोशः परमो ह्यन्यो राज्ञां पुरुषसञ्चय़ात् ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३१
भीष्म उवाच
न कोशः शुद्धशौचेन न नृशंसेन जाय़ते |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
कर्ण उवाच
न कौरवाः शेकुरुदीक्षितुं जय़ं; यथा रविं व्याधितचक्षुषो जनाः ||
५५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
न क्रिय़ाभिर्न शस्त्रेण मृत्योः कश्चिद्विमुच्यते ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२२
भीष्म उवाच
न क्रुध्यन्ति न हृष्यन्ति नापराध्यन्ति कस्यचित् |
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
७४
शुक्र उवाच
न क्रुध्येद्यश्च सर्वस्य तय़ोरक्रोधनोऽधिकः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
न क्रुध्येन्न प्रहृष्येच्च मानितोऽमानितश्च यः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
न क्रोधलोभौ तत्रास्तामशुभं च विशां पते |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः |
१३३ क
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
न क्रोधो न च मात्सर्यं नानृतं मधुसूदन |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
न क्रोधो न च मात्सर्यं नावमानो न सम्भ्रमः |
२० क