द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
न तेषां दुष्करं किञ्चित्त्रिषु लोकेषु विद्यते |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
न तेषां भवता कार्यं न कार्यं तव तैरपि |
८५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
न तेषां भिद्यते वृत्तं यज्ञस्वाध्याय़कर्मभिः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
न तेषां भिद्यते वृत्तं यत्पुरा साधुभिः कृतम् |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२७
कर्ण उवाच
न तेषां मतिपूर्वं हि सुकृतं दृश्यते क्वचित् |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
न तेषां मानुषो जेता त्वदन्य इह विद्यते ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३०
भीष्म उवाच
न तेषां वचनाद्राजा सत्कुर्याद्यातय़ेत वा ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
न तेषां विद्यते पापं सङ्ग्रामे वा पराजय़ः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
न तेषां विद्यतेऽवृत्तं यज्ञस्वाध्याय़शीलिनाम् |
५९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
न तेषां स्खलितं तत्र नासीदपहुतं तथा |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
न तेषां स्त्रीकृतस्तापो न लोकैश्वर्यमत्सरः ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
न तेषामभवद्राजन्क्षय़ो युद्धे कथञ्चन ||
२७ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
न तेषु दस्यवः सन्ति म्लेच्छजात्योऽपि वा नृप |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२९१
कुन्त्यु उवाच
न तेषु ध्रिय़माणेषु विधिलोपो भवेदय़म् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
७४
देवय़ान्यु उवाच
न तेषु निवसेत्प्राज्ञः श्रेय़ोर्थी पापवुद्धिषु ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
न तेषु प्रतिकर्तव्यं पश्यामि कुरुनन्दन |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
न तेषु सज्जते स्नेहः पद्मपत्रेष्विवोदकम् ||
३२ ख
विराट पर्व
अध्याय
६०
अर्जुन उवाच
न तेऽद्य तूर्याणि समाहतानि; यथावदुद्यान्ति गतस्य युद्धे ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
विश्वामित्र उवाच
न तेऽधिकारो धर्मेऽस्ति मा भूरात्मप्रशंसकः ||
७८ ख
विराट पर्व
अध्याय
११
विराट उवाच
न तेऽनुरूपं हय़कर्म विद्यते; प्रभासि राजेव हि संमतो मम ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२०४
वृद्धावू ऊचतुः
न तेऽन्यद्दैवतं किञ्चिद्दैवतेष्वपि वर्तते |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
न तेऽपराधमिह वै दृष्टवानस्मि सुव्रत |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
न तेऽपवर्गः सुकृताद्विनाकृत; स्तथा यथान्येषु वरेषु मानद |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
नारद उवाच
न तेऽपि तुल्या मरुतः किं पुनस्त्वं वनस्पते ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१९४
मार्कण्डेय़ उवाच
न तेऽभिगमनं व्रह्मन्मोघमेतद्भविष्यति |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
न तेऽभिशङ्के वचनं यद्व्रवीषि तपोधन |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
न तेऽर्जुनस्तथा ज्ञेय़ो ज्ञातव्यः सात्यकिर्यथा |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
न तेऽवमानमर्हन्ति न च ते दूषय़न्ति तम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
न तेऽस्ति भय़मस्मत्तो जीवितेनात्मनः शपे ||
१२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
द्रोण उवाच
न तेऽस्ति विजय़स्तावद्यावद्युध्याम्यहं रणे |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वासुदेव उवाच
न तेऽस्ति वृजिनं किञ्चिन्मय़ा दृष्टं महाद्युते ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
न तेऽस्त्यन्यन्मय़ा कृत्यं किञ्चिदन्यत्र भक्षणात् ||
१५९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
वृहस्पतिरु उवाच
न तेऽस्त्यविदितं किञ्चित्त्रिषु लोकेषु पावक ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
इन्द्र उवाच
न तेऽस्त्यविदितं किञ्चित्त्रिषु लोकेषु यद्भवेत् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
वैशम्पाय़न उवाच
न तेऽस्त्यविदितं किञ्चित्सर्वलोकेषु नित्यदा ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१८९
मार्कण्डेय़ उवाच
न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिदतीतानागतं भुवि |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिदस्मिँल्लोके द्विजोत्तम ||
२ ग
वन पर्व
अध्याय
१३१
राजो उवाच
न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिदिति त्वा लक्षय़ाम्यहम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२०४
मार्कण्डेय़ उवाच
न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिद्धर्मेष्विह हि दृश्यते ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिद्भूतभव्यस्य भारत |
३८ क
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिद्वेदितव्यं परन्तप |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
दुर्योधन उवाच
न तेऽस्त्रगोचरे शक्ताः स्थातुं देवाः सवासवाः |
८१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
न तैरनभ्यनुज्ञातो धर्ममन्यं प्रकल्पय़ेत् |
५ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
न तैरहं विना वत्स्ये ज्ञातिभिर्भ्रातृभिस्तथा ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
न तैर्भुक्तेय़मवनिर्न नार्यो गीतवादितम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
न तौ धीराः प्रशंसन्ति नित्यमुद्विग्नचेतसौ ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
न त्यागो न पुनर्याच्ञा न तपो मनुजेश्वर |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
न त्रासिनो न चपला न रौद्राः सत्पथे स्थिताः ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
न त्राय़ेय़ुर्भवन्तो मां समस्ताः पतय़ः क्षितेः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
न त्रिदण्डे न शय़ने नाग्नौ न शरणालय़े ||
२२ ख