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द्रोण पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
न त्वेनं युध्यमानं वै हन्यादपि शतक्रतुः ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय ५२
वृहदश्व उवाच
न त्वेनं शक्नुवन्ति स्म व्याहर्तुमपि किञ्चन |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०२
कण्व उवाच
न त्वेनममृतप्राशं चकार वलवृत्रहा ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १३८
लोमश उवाच
न त्वेनमुपतिष्ठन्ति हतपुत्रं तदाग्नय़ः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
न त्वेव कार्यं नैराश्यमस्माभिर्विजय़ं प्रति |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १६६
गन्धर्व उवाच
न त्वेव कुशिकोच्छेदं मेने मतिमतां वरः ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
न त्वेव चेलसंसर्गं रचय़ेदरिभिः सह ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
न त्वेव जाल्मीं कापालीं वृत्तिमेषितुमर्हसि |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
न त्वेव जाल्मीं कापालीं वृत्तिमेषितुमर्हसि |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
न त्वेव भीताः पाञ्चालाः कथञ्चित्स्युः पराङ्मुखाः |
९५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
न त्वेव मन्ये पुरुषस्य कर्म; संवर्तते सुप्रय़ुक्तं यथावत् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
न त्वेव मन्ये पुरुषस्य राज; न्ननागतं ज्ञाय़ते यद्भविष्यम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
न त्वेव वचनं किञ्चिदनिमित्तादिहोच्यते ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
न त्वेव वणिजं तात श्राद्धेषु परिकल्पय़ेत् ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वेव वीभत्सुरलं नृशंसं; कर्तुं न पापेऽस्य मनो निविष्टम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
न त्वेव वुध्यतेऽव्यक्तं सगुणं वाथ निर्गुणम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
हंस उवाच
न त्वेव सम्यग्लभते प्रशंसां; न वृत्तमाप्नोति महाकुलानाम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
न त्वेवं मम सन्तोषाद्रोचतेऽन्यन्मृगाधिप |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
न त्वेवं वर्तमानानामावृत्तिर्विद्यते पुनः |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११३
भीष्म उवाच
न त्वेवं वर्तितव्यं स्म यथेदमनुशुश्रुमः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७८
अर्जुन उवाच
न त्वेवं वेद वै कश्चिद्यथा त्वं मधुसूदन ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय ७१
कच उवाच
न त्वेवं स्यात्तपसो व्ययो मे; ततः क्लेशं घोरमिमं सहामि ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय २५२
जय़द्रथ उवाच
न त्वेवमेतेन विभीषणेन; शक्या वय़ं त्रासय़ितुं त्वय़ाद्य ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२९
भीष्म उवाच
न त्वेवात्मा प्रदातव्यः शक्ये सति कथञ्चन ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
न त्वेवाप्यतिवृद्धानां पुनर्वाला हि ते मताः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७०
भीष्म उवाच
न त्वेवासां दानमात्रं प्रशस्तं; पात्रं कालो गोविशेषो विधिश्च |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
न त्वेवासां दानमात्रं प्रशस्तं; पात्रं कालो गोविशेषो विधिश्च |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
न त्वेवास्मद्विधः प्राज्ञः संमोहं गन्तुमर्हति |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय २
कर्ण उवाच
न त्वेवाहं न गमिष्यामि तेषां; मध्ये शूराणां तत्तथाहं व्रवीमि |
३३ क
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
न त्वेवाहं न गमिष्यामि मध्यं; तेषां शूराणामिति मा शल्य विद्धि |
५३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५३
भीष्म उवाच
न त्वेवोत्सादनीय़ा मे पाण्डोः पुत्रा नराधिप |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३१
भीष्म उवाच
न त्वेवोद्धृतमर्यादैर्दस्युभिः सहितश्चरेत् |
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०७
गुरुरु उवाच
न त्वेषामर्थसामान्यमन्तरेण गुणानिमान् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २५०
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वेह वक्तास्ति तवेह वाक्य; मन्यो नरो वाप्यथ वापि नारी ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वय़ं निन्दितं कर्म कुर्यात्कृष्णः कथञ्चन |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
न त्वय़ं पार्थिवेन्द्राणामवमानः प्रय़ुज्यते |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वय़ा पुरुषार्थश्च कश्चिदस्तीह जीवता |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
न त्वय़ा सदृशः कश्चित्त्रिषु लोकेषु विद्यते ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ४१
भगवानु उवाच
न त्वय़ा सदृशः कश्चित्पुमान्मर्त्येषु मानद |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
न त्वय़ा सदृशः कश्चित्पुरुषेष्वमरोपम |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३
नारद उवाच
न त्वय़ा सदृशो युद्धे भविता क्षत्रिय़ो भुवि ||
३२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वय़ा सुहृदां वाक्यं व्रुवतामवधारितम् |
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय ६६
दुर्योधन उवाच
न त्वय़ेदं श्रुतं राजन्यज्जगाद वृहस्पतिः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
न तय़ोरन्तरं कश्चिद्ददर्श नरसिंहय़ोः ||
६३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
न तय़ोरन्तरं कश्चिद्ददृशे भरतर्षभ |
५७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
न तय़ोर्विवरं कश्चिद्रणे पश्यति भारत |
६० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
न दण्डकाष्ठसाध्यं च मन्ये कार्यमिदं तव ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११८
कीट उवाच
न दत्तमर्थकामेन देय़मन्नं पुनाति ह ||
२१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
न दत्तवाञ्श्रिय़ं दीप्तां पितृपैतामहीमिमाम् ||
६ ख