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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
न द्वेष्टा नोपदेष्टा च भवेत निरुपस्कृतः |
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३६
श्रीभगवानु उवाच
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
गौतम उवाच
न द्वेष्यो न प्रिय़ः कश्चिन्न वन्धुर्न रिपुस्तथा |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
न धनं यज्ञशीलानां हार्यं देवस्वमेव तत् |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
न धनानि न वासांसि न भोगान्न च काञ्चनम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
न धनार्थो न दारार्थस्तेषां येषामराजकम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
न धनेन न राज्येन नोग्रेण तपसा तथा |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५२
युधिष्ठिर उवाच
न धर्मः परिपाठेन शक्यो भारत वेदितुम् ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
न धर्मः प्रीय़ते तात दानैर्दत्तैर्महाफलैः |
७३ क
स्त्री पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
न धर्मः सत्कृतः कश्चिन्नित्यं युद्धमिति व्रुवन् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
न धर्मकालः पुरुषस्य निश्चितो; न चापि मृत्युः पुरुषं प्रतीक्षते |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २३९
वैशम्पाय़न उवाच
न धर्मधनसौख्येन नैश्वर्येण न चाज्ञय़ा |
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
न धर्मध्वजिनश्चैव न गुह्यं किञ्चिदास्थिताः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
न धर्मपर एव स्यान्न चार्थपरमो नरः |
३८ ख
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
न धर्मफलमाप्नोति यो धर्मं दोग्धुमिच्छति |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
न धर्मवचनं वाचा न वुद्ध्या चेति नः श्रुतम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
न धर्मसङ्करकरी स्वधर्मेऽस्मि धृतव्रता ||
१८५ ख
सभा पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
न धर्मसौक्ष्म्यात्सुभगे विवक्तुं; शक्नोमि ते प्रश्नमिमं यथावत् |
४० क
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
न धर्माच्चलते वुद्धिर्धर्मराजस्य धीमतः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
न धर्मात्परमो लाभस्तपो नानशनात्परम् ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८१
पराशर उवाच
न धर्मार्थी नृशंसेन कर्मणा धनमर्जय़ेत् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६५
भीष्म उवाच
न धर्मे जाय़ते वुद्धिर्व्याजाद्धर्मं करोति च ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २०१
व्याध उवाच
न धर्मे जाय़ते वुद्धिर्व्याजाद्धर्मं करोति च ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
न धर्मोऽस्तीति मन्वानः शुचीनवहसन्निव |
१९ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
न धर्मोऽस्तीति मन्वानाः शुचीनवहसन्ति ये |
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
न धर्षय़ति मार्जार तेन मे स्वस्ति साम्प्रतम् ||
५२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
न धर्षय़न्ति क्रव्यादा जीवन्तीति जनार्दन ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१८
श्रीरु उवाच
न धाता न विधाता मां विदधाति कथञ्चन |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
न धार्तराष्ट्राः शक्ष्यन्ति स्थातुं दृष्ट्वा धनञ्जय़म् ||
४३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
न धृत्या न पुनस्त्यागान्मृत्योः कश्चिद्विमुच्यते ||
५५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
न ध्रुवं सुखमस्तीह कुतो राज्यं कुतो यशः |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
न न एकेन योद्धव्यं कथञ्चिदपि पाण्डवैः ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
न नः कालात्ययो वै स्यादिहैव परिलम्वताम् |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
न नः स समितिं गच्छेद्यश्च नो निर्वपेत्कृषिम् ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय ५१
वृहदश्व उवाच
न नक्तं न दिवा शेते हा हेति वदती मुहुः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
न नग्नः कर्हिचित्स्नाय़ान्न निशाय़ां कदाचन |
७४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
न नग्नामीक्षते नारीं न विद्वान्पुरुषानपि |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय ७७
शर्मिष्ठो उवाच
न नर्मय़ुक्तं वचनं हिनस्ति; न स्त्रीषु राजन्न विवाहकाले |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
न नर्मय़ुक्तं वचनं हिनस्ति; न स्त्रीषु राजन्न विवाहकाले |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७
भीष्म उवाच
न नश्यति कृतं कर्म सदा पञ्चेन्द्रिय़ैरिह |
५ क
आदि पर्व
अध्याय २२३
सारिसृक्व उवाच
न नस्त्राता विद्यतेऽग्ने त्वदन्य; स्तस्माद्धि नः परिरक्षैकवीर ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १००
नारद उवाच
न नागलोके न स्वर्गे न विमाने त्रिविष्टपे |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
न नाथमध्यगच्छन्त वध्यमाना महारणे ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
न नाम धुरि राजेन्द्र प्रय़ोक्तुं त्वमिहार्हसि |
३० क
विराट पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
न नाशमधिगच्छेय़ुरिति मे धीय़ते मतिः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
न निःशेषेण मन्तव्यमचिकित्स्येन वा पुनः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०७
राजपुत्र उवाच
न निकृत्या न दम्भेन व्रह्मन्निच्छामि जीवितुम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
न नित्यं परिभूय़ारीन्सुखं स्वपिति वासव |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
न नित्यं लभते दुःखं न नित्यं लभते सुखम् ||
१९ ख