शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
न नित्यं लभते दुःखं न नित्यं लभते सुखम् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
वासुदेव उवाच
न निद्रा न च मे हर्षो मनसोऽस्ति युधां वर ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
न निद्रामधिगच्छामि चिन्तय़ानो वृकोदर |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
न निन्देदन्नभक्ष्यांश्च स्वाद्वस्वादु च भक्षय़ेत् ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
न निर्दहति ते यावत्क्रोधदीप्तेक्षणश्चमूम् |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
न निर्मन्युः क्षत्रिय़ोऽस्ति लोके निर्वचनं स्मृतम् |
३४ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
न निर्वध्नाति राजानं लभते प्रग्रहं पुनः ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
न निर्वपति पञ्चानामुच्छ्वसन्न स जीवति ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
न निर्विवित्सो नावृत्तो नापवृत्तोऽस्ति कश्चन ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
न निर्वेदं मुनिर्गच्छेत्कुर्यादेवात्मनो हितम् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
न निवर्तितपूर्वं च कदाचिद्रणमूर्धनि |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
७१
शुक्र उवाच
न निवर्तेत्पुनर्जीवन्कश्चिदन्यो ममोदरात् |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
न निवर्तय़ितुं चापि शक्येय़ं महती चमूः |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
न निवार्यो निवार्यः स्यादन्यथा प्रस्थितो वनम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२८४
कर्ण उवाच
न निवार्यो व्रतादस्मादहं यद्यस्मि ते प्रिय़ः ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
न निवारय़ितुं शक्याः सङ्ग्रामात्ते परन्तपाः ||
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
६७
युधिष्ठिर उवाच
न निवृत्तिस्तय़ोरस्ति देवितव्यं पुनर्यदि ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
व्राह्मण उवाच
न निष्ठामधिगच्छन्ति वुद्धिस्तामधिगच्छति ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
न निह्नवं सत्रगतस्य गच्छे; त्संसृष्टमन्त्रस्य कुसङ्गतस्य |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
न निय़ोज्याश्च वः शिष्या अनिय़ोगे महाभय़े |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
न नूनं कर्मभिः पुण्यैरश्नुते पुरुषः सुखम् |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
श्वपच उवाच
न नूनं कार्यमेतद्वै हर कामं श्वजाघनीम् ||
६८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
न नूनं क्षत्रिय़कुले जातः सम्प्रथिते भुवि |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
न नूनं तस्य पापस्य दुःखमस्मासु किञ्चन |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
न नूनं देहभेदोऽस्ति काले तस्मिन्समागते |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८
धृतराष्ट्र उवाच
न नूनं परदुःखेन कश्चिन्म्रिय़ति सञ्जय़ |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
न नूनं म्रिय़ते दुःखैः सा चेज्जीवति केशव |
४५ क
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
न नूनं विद्यतेऽसह्यं मानुष्ये किञ्चिदेव हि |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
न नूनं सुकृतस्येह फलं कश्चित्समश्नुते |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
न नूनं स्वस्ति पार्थस्य यथा नदति शङ्खराट् |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
न नूनमस्त्राणि वलं पराक्रमः; क्रिय़ा सुनीतं परमाय़ुधानि वा |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
न नृत्तगीतशीलेषु हासकेषु च धार्मिकः ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
न नृशंसेन लुव्धेन नाप्रशान्तेन भारत ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२५
सूत उवाच
न नो भञ्ज्यादिति तदा दिव्याः कनकशाखिनः ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
न न्यवर्तन्त कौरव्या व्रह्मलोकपुरस्कृताः ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
न न्याय़्यं निहतः शत्रुर्भूय़ो हन्तुं जनाधिपाः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
न न्यूनं कष्टशव्दं वा व्युत्क्रमाभिहितं न च |
८९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
न पक्षिणः सम्पतन्त्यन्तरिक्षे; क्षेपीय़सास्त्रेण कृतेऽन्धकारे ||
३४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भृगुरु उवाच
न पञ्चसाधारणमत्र किं चि; च्छरीरमेको वहतेऽन्तरात्मा |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१९
नमुचिरु उवाच
न पण्डितः क्रुध्यति नापि सज्जते; न चापि संसीदति न प्रहृष्यति |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
न पण्डितज्ञानपरोपतापिने; देय़ं त्वय़ेदं विनिवोध यादृशे ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
न पतत्यरिभिर्ग्रस्तः पतितश्चावतिष्ठते ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
सञ्जय़ उवाच
न पद्भ्यां स्पृशते भूमिं न च शूलं विमुञ्चति |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
न परं पुण्डरीकाक्षाद्दृश्यते भरतर्षभ |
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
व्यास उवाच
न परं विद्यते तस्मादेवमन्यच्छुभं कुरु ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
न परस्य श्रवादेव परेषां दण्डमर्पय़ेत् |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
न परीप्सन्ति ये भार्यां वध्यमानां दुरात्मना ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७१
भगवानु उवाच
न पर्याय़ोऽस्ति यत्साम्यं त्वय़ि कुर्युर्विशां पते |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८६
दुर्योधन उवाच
न पर्याय़ोऽस्ति यद्राजञ्श्रिय़ं निष्केवलामहम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भरद्वाज उवाच
न पश्यति न च व्रूते न शृणोति न जिघ्रति |
१७ क