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द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
न मां भीत इति व्रूय़ुराय़ान्तं फल्गुनं प्रति ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
न मां मनुष्याः पश्यन्ति न मां पश्यन्ति देवताः |
२९ ख
वन पर्व
अध्याय ११४
लोमश उवाच
न मां मर्त्याय़ भगवन्कस्मैचिद्दातुमर्हसि |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
न मां माधव वैधव्यं नार्थनाशो न वैरिता |
६८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
न मां रथस्थो भूमिष्ठमसज्जं हन्तुमर्हसि |
६४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९१
भगवानु उवाच
न मां व्रूय़ुरधर्मज्ञा मूढा असुहृदस्तथा |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
न मां शक्तस्तक्षको नागराजो धर्षय़ितुमिति ||
१२० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ८१
श्रीरु उवाच
न मां सम्प्रति गृह्णीथ कस्माद्वै दुर्लभां सतीम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
न मांसलोभात्तपसो नाशस्ते स्यान्महामुने ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
न मांसात्परमत्रान्यद्रसतो विद्यते भुवि ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
न माता न पिता किञ्चित्कस्यचित्प्रतिपद्यते |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
न मातिक्रमते पार्थो धनुष्पाणिमवस्थितम् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
न मातृपितृवद्राजन्धाता भूतेषु वर्तते |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
न मातृपितृवान्धवा न संस्तुतः प्रिय़ो जनः |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
न मातृपितृशुश्रूषा न च दैवतपूजनम् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
न मात्रामनुरुध्यन्ते न धर्मच्छलमन्ततः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
न मात्रार्थे रोचय़ते विवादं; नापूजितः कुप्यति चाप्यमूढः ||
९० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
न मादृशोऽन्यो नरदेव विद्यते; धनुर्धरो देवमृते पिनाकिनम् |
९३ क
आदि पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
न मानुषीणां जठरं प्रविशेमाशुभं वय़म् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
न मान्यं मानय़िष्यन्ति इति मन्येदमानितः ||
२९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
न मान्यमानो मन्येत नामानादभिसञ्ज्वरेत् ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय ८५
यय़ातिरु उवाच
न मान्यमानो मुदमाददीत; न सन्तापं प्राप्नुय़ाच्चावमानात् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
न मानय़सि मानार्ह रुदतीमरिकर्शन ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
दुर्योधन उवाच
न मामकान्पाण्डवास्ते समर्थाः प्रतिवीक्षितुम् |
४० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
न मामतः परं पुत्र परिक्लेष्टुमिहार्हसि ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ७५
दमय़न्त्यु उवाच
न मामर्हसि कल्याण पापेन परिशङ्कितुम् |
१ क
स्त्री पर्व
अध्याय १४
भीमसेन उवाच
न मामर्हसि गान्धारि दोषेण परिशङ्कितुम् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
भीष्म उवाच
न मामर्हसि देवर्षे निय़ोक्तुं प्रश्न ईदृशे ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ७२
देवय़ान्यु उवाच
न मामर्हसि धर्मज्ञ त्यक्तुं भक्तामनागसम् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७५
होत्रवाहन उवाच
न मामर्हसि धर्मज्ञ परचित्तां प्रदापितुम् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
न मामर्हसि धर्मज्ञ परित्यक्तुमनागसम् |
३२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
न मामर्हसि धर्मज्ञ परित्यक्तुमनागसम् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
न मामर्हसि धर्मज्ञ वक्तुमेवं कथञ्चन |
२ क
सभा पर्व
अध्याय ४५
दुर्योधन उवाच
न मामवति तद्भुक्तं श्रिय़ं दृष्ट्वा युधिष्ठिरे |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
कर्ण उवाच
न मामस्मादभिप्राय़ात्कश्चिदद्य निवर्तय़ेत् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
न मामेवंविधां मुक्तामीदृशं वक्तुमर्हसि ||
१६२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ६
युधिष्ठिर उवाच
न मामय़शसा दग्धं भूय़स्त्वं दग्धुमर्हसि ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
न माय़या न दम्भेन य इच्छेद्भूतिमात्मनः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
न माय़ा हीन्द्रजालं वा कुहका वा विभीषणी |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
न मित्रध्रुङ्नैकृतिकः कृतघ्नः; शठोऽनृजुर्धर्मविद्वेषकश्च |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय १९६
कर्ण उवाच
न मित्राण्यर्थकृच्छ्रेषु श्रेय़से वेतराय़ वा |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय २७
सूत उवाच
न मिथ्या व्रह्मणो वाक्यं कर्तुमर्हथ सत्तमाः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय ८८
यय़ातिरु उवाच
न मिथ्याहं विक्रय़ं वै स्मरामि; वृथा गृहीतं शिशुकाच्छङ्कमानः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
न मुञ्चति स्वकं गन्धं तद्वत्सूक्ष्मस्य दर्शनम् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
न मुञ्चेय़महं वाणानिति कौरवनन्दन |
६३ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
न मुह्येदर्थकृच्छ्रेषु न च धर्मं परित्यजेत् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
न मुह्येदर्थकृच्छ्रेषु प्रजाहितमनुस्मरन् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
न मुह्येस्त्वं सञ्जय़ जातु मत्या; न च क्रुध्येरुच्यमानोऽपि तथ्यम् ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
इन्द्र उवाच
न मूर्खं जनय़ेत्पुत्रं न भवेच्च निराकृतिः ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
न मूर्च्छितः कटुकान्याह किं चि; त्प्रिय़ं सदा तं कुरुते जनोऽपि ||
९२ ख