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शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
न पुनः सौवलो राजा युद्धमभ्यागमिष्यति ||
५९ ख
वन पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
न पुनरुदमज्जत् ||
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
न पुनर्जीवितः कश्चित्कालधर्ममुपागतः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
पिङ्गलो उवाच
न पुनर्वञ्चय़िष्यन्ति प्रतिवुद्धास्मि जागृमि ||
५० ख
सभा पर्व
अध्याय ६१
अर्जुन उवाच
न पुरा भीमसेन त्वमीदृशीर्वदिता गिरः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
न पुल्कसो न चण्डाल आत्मानं त्यक्तुमिच्छति |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५०
नारद उवाच
न पूजय़सि पूज्यं तं किमन्यद्वुद्धिलाघवात् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६८
सञ्जय़ उवाच
न पूजय़ेत्त्वा कोऽन्वद्य यत्त्रय़ोदशवार्षिकम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
न पूर्णोऽस्मीति मन्येत धर्मतः कामतोऽर्थतः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
न पूर्वे नापरे चक्रुरिदं केचन मानवाः |
६३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
न पूर्वे नापरे जातु कामानामन्तमाप्नुवन् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
नारद उवाच
न पृच्छेद्गोत्रचरणं स्वाध्याय़ं देशमेव वा |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
न पृथिव्या सकलय़ा न सुवर्णस्य राशिभिः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
न पृथिव्या सकलय़ा न सुवर्णस्य राशिभिः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४४
सनत्सुजात उवाच
न पृथिव्यां तिष्ठति नान्तरिक्षे; नैतत्समुद्रे सलिलं विभर्ति ||
१९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
न पृष्ठतः करिष्यन्ति पौरजानपदा जनाः ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
न पृष्ठतः कृतश्चापि सङ्ग्रामस्तेन दुस्तरः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २९७
यक्ष उवाच
न पेय़मुदकं राजन्प्राणानिह परीप्सता |
२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
अश्व उवाच
न प्रकाशन्त वेश्मानि धूमरुद्धानि भारत |
४८ क
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
न प्रजास्यति चाप्येष मानुषेषु महामनाः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भृगुरु उवाच
न प्रणाशोऽस्ति जीवानां दत्तस्य च कृतस्य च |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
न प्रतिष्ठति ते नूनं तेनासि हरिणः कृशः ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
न प्रत्यक्षं परोक्षं वा किञ्चिद्दुष्टं समाचरेत् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६९
भीष्म उवाच
न प्रत्यक्षं परोक्षं वा दूषणं व्याहरेत्क्वचित् ||
४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
न प्रत्यभाच्च यज्ञस्तान्वेदा वभ्रंशिरे तदा ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ५३
शौनक उवाच
न प्रत्यभात्तदाग्नौ यन्न पपात स तक्षकः ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय ६८
अर्जुन उवाच
न प्रदास्यति चेद्राज्यमितो वर्षे चतुर्दशे |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१२
भीष्म उवाच
न प्रभावेण गन्तव्यमन्तरिक्षचरेण वै ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
न प्रभुः स्यात्कुलस्यास्य न वय़ं मर्षय़ेमहि ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
न प्रमत्ताय़ भीताय़ विरथाय़ प्रय़ाचते |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
न प्रमाणस्थितिर्ह्यस्ति पुष्येऽस्मिन्भरतर्षभ |
७ क
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
न प्रमाणेन नोत्साहात्सत्त्वस्थो भव पाण्डव ||
६१ ख
वन पर्व
अध्याय २७७
मार्कण्डेय़ उवाच
न प्रमादश्च धर्मेषु कर्तव्यस्ते कथञ्चन ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
न प्रमाद्यति संमोहात्सततं मुक्त एव सः ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
न प्रवक्तव्यमिह हि किञ्चिद्वर्णावरे जने ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
न प्रवृत्तिरृते शास्त्रात्काचिदस्तीति निश्चय़ः |
५५ क
सभा पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
न प्रवेक्ष्यामि वो देशं वाध्यत्वं यदि मानुषैः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
न प्रवोध्योऽस्मि संसुप्त इत्युवाचाथ भार्गवः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
न प्रवोधय़तां तं च तौ तदा रजनीक्षय़े ||
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
न प्रष्टव्येति मन्वानो न स तां किञ्चिदूचिवान् ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
न प्रसीदति मे रुद्रः किमेतदिति चिन्तय़न् |
१०५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
न प्रहर्तुमभीप्सामि गृहीतेषुं कथञ्चन ||
७८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
न प्रहृष्यति लाभैर्यो यश्च कामैर्न तृप्यति ||
१२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २३२
व्यास उवाच
न प्रहृष्येत लाभेषु नालाभेषु च चिन्तय़ेत् |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय २७
श्रीभगवानु उवाच
न प्रहृष्येत्प्रिय़ं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रिय़म् |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
न प्राजहन्भीमसेनं भय़े जाते महावलम् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
न प्राज्ञाय़त देवेन्द्रस्त्वभिभूतः स्वकल्मषैः |
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
न प्राज्ञाय़न्त समरे दिशश्च प्रदिशस्तथा ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
न प्राज्ञाय़न्त समरे दिशो वा प्रदिशोऽपि वा ||
५७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
दुर्योधन उवाच
न प्राणहेतोर्न भय़ान्न विषादाद्विशां पते |
३७ क