वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
न क्रोधोऽभ्यन्तरस्तस्य भवतीति विनिश्चितम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
न क्लीवस्य गृहे पुत्रा मत्स्याः पङ्क इवासते ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
न क्लीवो वसुधां भुङ्क्ते न क्लीवो धनमश्नुते |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
न क्वचित्सुखमत्यन्तं न क्वचिच्छाश्वती स्थितिः |
२९ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
न क्वचिद्धि मय़ा दृष्टस्तादृशो नैव च श्रुतः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
न क्षंस्यति पिता पुत्रं पुत्रश्च पितरं तथा |
४२ क
सभा पर्व
अध्याय
६६
दुर्योधन उवाच
न क्षंस्यन्ते तथास्माभिर्जातु विप्रकृता हि ते |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
न क्षत्रिय़ा रणे राजन्वर्जय़न्ति परस्परम् |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
न क्षुत्पिपासे न ग्लानिं प्राप्य तां प्राप्नुवन्त्युत ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
गौतम उवाच
न क्षुत्पिपासे न ग्लानिर्न दुःखं न सुखं तथा ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
न क्षुत्पिपासे न ग्लानिर्न शीतोष्णभय़ं तथा ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
न क्षुत्पिपासे राजेन्द्र भूमेश्छिद्रे भविष्यतः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
न खरैः सम्प्रय़ातस्य स्वधर्माज्ञानकस्य च |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
न खलु मम तुषोऽपि दह्यतेऽत्र; स्वय़मिदमाह किल स्म भूमिपालः ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
न खल्वप्यरसज्ञस्य कामः क्वचन जाय़ते |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४७
भीष्म उवाच
न खल्वस्यकृतार्थेन स्त्रीवुद्ध्या मार्दवीकृता |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
न खल्वहमिदं शून्ये रौमि किं न शृणोषि मे ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
जनमेजय़ उवाच
न खल्वासीत्पुनर्युद्धं तस्य यक्षैर्द्विजोत्तम ||
३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
न खादति च यो मांसं सममेतन्मतं मम ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
न गच्छतः स्वर्गलोकं सुकृतेनेह कर्मणा ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
न गच्छतोपस्पृष्टं भवति न स्थितेनेति ||
११४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
युधिष्ठिर उवाच
न गच्छन्ति पुनर्भावं मुनय़ः संशितव्रताः |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
१४
द्रौपद्यु उवाच
न गच्छेय़महं तस्य राजपुत्रि निवेशनम् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
७९
द्रुह्युरु उवाच
न गजं न रथं नाश्वं जीर्णो भुङ्क्ते न च स्त्रिय़म् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
न गणाः कृत्स्नशो मन्त्रं श्रोतुमर्हन्ति भारत ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
न गतिः कर्मणां शक्या वेत्तुमीशस्य तत्त्वतः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
८३
नारद उवाच
न गतिर्विद्यतेऽन्यस्य त्वामृते कुरुनन्दन ||
१०० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
न गदेन न साम्वेन यदिदं प्रार्थितं त्वय़ा ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
न गन्तव्यं न गन्तव्यमिति मद्रानवारय़त् ||
२ ग
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
न गन्तव्यं महाप्राज्ञ त्राहि चास्मान्महाभय़ात् ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
न गन्तव्यमितः पुत्र तवाहारमहं सदा |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
द्युमत्सेन उवाच
न गन्धर्वपितॄणां च कः कस्येह न कश्चन ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२२
व्राह्मण उवाच
न गन्धानधिगच्छन्ति घ्राणस्तानधिगच्छति ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
न गवार्थं यशोर्थं वा धर्मस्तेषां युधिष्ठिर |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
न गवाश्वेन सर्वेण ते त्याज्या य इमे हताः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
न गात्रावय़वैरन्यैः स्पृशामि त्वा नराधिप ||
१६९ ख
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
न गाथा गाथिनं शास्ति वहु चेदपि गाय़ति |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
न गामय़ुञ्जन्त धुरि कृशाङ्गाश्चाप्यजीवय़न् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
न गावो नान्नविकृतिं प्रय़च्छन्ति कदाचन ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
न गुणा विदुरात्मानं गुणान्वेद स सर्वदा ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
न गुणा विदुरात्मानं स गुणान्वेत्ति सर्वशः |
४० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
न गुणा विदुरात्मानं सृज्यमानं पुनः पुनः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३९
व्यास उवाच
न गुणानतिवर्तन्ते गुणेभ्यः परमा मताः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
न गुणो दृश्यते कश्चित्प्रजाः सन्धारय़न्ति च ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
न गुरावकृतप्रज्ञे शक्यं शिष्येण वर्तितुम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
न गुर्वक्षरसम्वद्धं पराङ्मुखमुखं न च |
८८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
न गुर्वर्थे नात्मनो जीवितार्थे; पञ्चानृतान्याहुरपातकानि ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
न गुह्यं धारय़िष्यन्तीत्यतिदुःखसमन्वितः ||
१० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
न गृहे मरणं तात क्षत्रिय़ाणां प्रशस्यते |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भृगुरु उवाच
न गृह्यते सुसूक्ष्मत्वाद्यथा ज्योतिर्न संशय़ः ||
६ ख